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ग़ज़ल ; यकायक चराग़ों को क्या हो गया है

122 122 122 122

यकायक चराग़ों को क्या हो गया है
बुझे थे, जले फिर, ये किसकी दुआ है.

चलो और दिन तो है बाकी, रूकें क्यों
शजर पे अभी नूर देखो झुका है.

इसी आरज़ू में कटी ज़िन्दगी ये
पता तो चले क्या हमारा हुआ है.

अभी छू नहीं सर्द हांथों से ऐ शब
अभी तो मुझे उसने मन से छुअा है.

मुहब्बत किसे रास आई है इसमें
अमीरी, ग़रीबी, ज़माना, जुआ है.

- श्री सुनील

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by shree suneel on May 27, 2015 at 10:46am
सराहना के लिए शुक्रिया आदरणीय सौरभ सर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 27, 2015 at 1:09am

बहुत खूब आदरणीय..

Comment by shree suneel on May 17, 2015 at 6:23pm
उत्साहवर्धन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय सुशील सरना सर. सादर
Comment by Sushil Sarna on May 17, 2015 at 2:26pm

यकायक चराग़ों को क्या हो गया है
बुझे थे, जले फिर, ये किसकी दुआ है.

वाह आदरणीय बहुत ही गहनभावों की मनभावन ग़ज़ल बन पड़ी है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by shree suneel on May 16, 2015 at 6:04pm
धन्यवाद.. आदरणीय मुकेश श्रीवास्तव जी.
Comment by shree suneel on May 16, 2015 at 6:02pm
बहुत बहुत शुक्रिया.. आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी.
Comment by shree suneel on May 16, 2015 at 6:00pm
आदरणीय वीनस केसरी सर, ग़ज़ल आपको अच्छी लगी इसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया...
Comment by MUKESH SRIVASTAVA on May 16, 2015 at 2:53pm

ACHHEE GAZAL MITRA

Comment by Shyam Narain Verma on May 16, 2015 at 11:17am
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।
Comment by वीनस केसरी on May 16, 2015 at 1:01am

वाह वा .. बहत खूब ग़ज़ल कही है

कृपया ध्यान दे...

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