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गज़ल - बहक ही जाने दो मुझको, कि अब बचा क्या है ( गिरिराज भंडारी )

1212   1122   1212   22  /112

चली गई मेरी मंज़िल कहीं पे चल के क्या

या रह गया मैं कहीं और ही बहल के क्या

 

वहाँ पे गाँव था मेरा जहाँ दुकानें हैं  

किसी से पूछता हूँ , देख लूँ टहल के क्या

 

असर बनावटी टिकता कहाँ था देरी तक

वही पलों में तुम्हें रख दिया बदल के क्या

 

हरेक हाथ में पत्थर छुपा हुआ देखा

ये गाँव फिर से रहेगा कभी दहल के क्या

 

मेरा ये घर सही मिट्टी, मगर ये मेरा है

मुझे न पूछ थे अरमाँ कभी महल के क्या

 

मुझे लगा कि अब , सूरज उदास रहता है

चलो तो पूछें, वो रोता रहा था ढल के क्या

 

बहक ही जाने दो मुझको, कि अब बचा क्या है

ये लम्हें आखिरी हैं अब करूँ सँभल के क्या

 

परों का साथ नहीं है जिसे उड़ानों में

तुम्हीं कहो वो करे फर्श पे उछल के क्या 

************************************** 

मौलिक एवँ अप्रकाशित 

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 10, 2015 at 8:58pm

आदरणीय नरेन्द्र भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 10, 2015 at 8:57pm

आदरणीय वीनस भाई , गज़ल पर आपकी गरिमामय उपस्थिति के लिये अपका आभारी हूँ ।  जिस मिसरे पर आपने गौर करने को कहा है वो  वास्तव मे  बे बह्र हो गया है , मै उसे सुधार कर फिर से लिख रहा हूँ ---  मुझे लगा है  ये  , सूरज उदास रहता है  ।

आदरणीय वीनस भाई , बाक़ी बातें कल , कह के आपने इशारा किया है , कहन में जो भी कमियाँ हों ज़रूर बताइयेगा , अब इसी कमी के पीछे लगा हुआ हूँ , और लगना पड़ेगा भी , मुझे मालूम है अभी बहुत सीखना बाक़ी है । आपका पुनः आभार ॥

Comment by shree suneel on May 10, 2015 at 4:33pm
चली गई मेरी मंज़िल कहीं पे चल के क्या
या रह गया मैं कहीं और ही बहल के क्या/
ख़ूब... अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीय गिरिराज सर, बधाई
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 8, 2015 at 10:04pm

आ0 भंडारी भाई जी,  गजब की गज़ल हुई है.  दाद कुबूल करे. सादर

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 8, 2015 at 2:13pm

अनुज भाई

  1. इस रदीफ़ पर गजल को निभाना ही बड़ी बात है i सादर
Comment by narendrasinh chauhan on May 8, 2015 at 11:07am

वाह क्या बात है , खूब सुन्दर ग़ज़ल ,

Comment by वीनस केसरी on May 8, 2015 at 2:33am

इस ग़ज़ल पर शेर दर शेर बहुत कुछ कहा जा सकता है ...
मगर अभी बस यही कहना है कि इस मिसरे पर फिर से गौर फरमा लें ...

मुझे लगा कि अब , सूरज उदास रहता है

बाकी बातें कल करूंगा ...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 7, 2015 at 10:58pm

आदरणीय विजय भाई , सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका आभारी हूँ । आपने सही कहा ' के क्या ' रदीफ चुन के मै  भी बहुत मुश्किल मे फँसा महसूस कर रहा था , बहुत समय लगा है ग़ज़ल पूरी होने में । आपका पुनःआभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 7, 2015 at 10:55pm

आदरणीय उमेश भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत शुक्रिया ॥

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 7, 2015 at 10:40pm
बहक ही जाने दो मुझको, कि अब बचा क्या है
ये लम्हें आखिरी हैं अब करूँ सँभल के क्या
" के क्या " कठिन तो है, पर आपने सरल बना दिया। बधाई आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, सादर।

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