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राजनीती - एक मुक्त तुकांत कविता

पार्टियों की रेस तो देखो कितनी है रफ़्तार

सत्ता में जब भी आ जाती, होता हाहाकार

 

चुनाव जीतकर आ जाए तो कितना अहंकार

भ्रष्टाचार का सभी तरफ फ़ैल गया अंधकार

 

काम करे सरकारी अफसर, कर रहे उपकार

रिश्वत खाकर फूले हैं और हो गए मक्कार

 

ईमानदारी पर आजकल मिलती है फटकार

बिक गए हैं बेईमानी में हम सब के संस्कार  

 

नेता भाई किसान को जाकर दे गए ललकार

दाम दे देंगे जमीन के बंद करो फुफकार

 

कदम कदम पे रह गया है, अब तो बस इनकार

जनता की सूखी रोटी, डकार रही सरकार 

निधि 

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 26, 2015 at 4:49pm

सुन्दर रचना पर बधाई आ० निधि जी!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 26, 2015 at 9:28am

सुंदर रचना है आदरणीया निधिजी बधाई आपको

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 24, 2015 at 1:21pm

सटीक व्यंग ...सुंदर प्रस्तुति के लिये बधाई ...सादर 

Comment by Neeraj Neer on April 24, 2015 at 9:05am

वाह बहुत खूब।

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 23, 2015 at 11:07pm
बहुत सुन्दर वर्णन , सुन्दर प्रस्तुति, आदरणीय सुश्री निधि अग्रवाल जी , बधाई , सादर।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 23, 2015 at 10:05pm

अच्छी प्रस्तुति, तनिक प्रयत्न हो तो ये द्विपदियाँ दोहों की शक्ल ले सकती हैं, बधाई आदरणीय निधि जी इस अभिव्यक्ति पर.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 23, 2015 at 8:37pm

सच्चाई को बयां करती ,सुंदर रचना आदरणीया निधि जी. हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 23, 2015 at 8:29pm
सत्य कहा। प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई आदरणीया निधि जी।

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