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ग़ज़ल : बीज मुहब्बत के गर हम तुम बो जाएँगे

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२

 

जीवन से लड़कर लौटेंगे सो जाएँगे

लपटों की नाज़ुक बाँहों में खो जाएँगे

 

बिना बुलाए द्वार किसी के क्यूँ जाएँ हम

ईश्वर का न्योता आएगा तो जाएँगे

 

कई पीढ़ियाँ इसके मीठे फल खाएँगी

बीज मुहब्बत के गर हम तुम बो जाएँगे

 

चमक दिखाने की ज़ल्दी है अंगारों को

अब ये तेज़ी से जलकर गुम हो जाएँगे

 

काम हमारा है गति के ख़तरे बतलाना

जिनको जल्दी जाना ही है, वो जाएँगे

----------

(मौलिक एवं अप्राकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 23, 2015 at 5:19pm

आ. समर साहब, आपके अमूल्य सुझावों के लिए आपका तह-द-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 23, 2015 at 1:39pm

धर्मेन्द्र जी

बहुत अच्छी गजल हुयी है . सादर ,

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2015 at 11:33am

बहुत खूब...लिमिटेड काफिये को प्राइवेट लिमिटेड बना दिया आपने ..बहुत खूब..
अंगारे --धुआँ हो जाएँगे टाइप कुछ करने से शायद उस शेर का रूप और निखरेगा.
बहुत बहुत बधाई आपको  

Comment by Samar kabeer on April 22, 2015 at 4:00pm
जनाब धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें |

दो अशआर की तरफ़ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा :-

(1) "जीवन से लड़कर लौटेंगे सो जाएँगे
लपटों की गोरी बाँहों में खो जाएँगे"

सानी मिसरा इस तरह करलें तो बहतर होगा :-

"हम तेरी गोरी बाहों में खो जाऐंगे"

क्यूँकि लपटों का रंग गोरा नहीं होता

(2)"चमक दिखाने की ज़ल्दी है अंगारों को
तब तो ये फ़ौरन जलकर गुम हो जाएँगे"

सानी मिसरा इस तरह करलें तो बहतर होगा :-

"कुछ ही देर में ये जलकर गुम हो जाऐंगे"

क्यूँकि अंगारे फ़ौरन जलकर गुम नहीं होते |

कृपया अन्यथा न लें |

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