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लोग मिलते हैं ...........'जान' गोरखपुरी

2122  2212  1222

लोग मिलते हैं अक्सर यहाँ मुहब्बत से
दिल हैं मिलते यारब बड़े ही मुद्दत से।

आज कल शामें हैं उदास बेवा सी
याद आये है कोई खूब सिद्दत से।

कोई होता है किस कदर अदाकारां
हम रहे इक टक देखते सौ हैरत से।

उसने मुझको यूँ शर्मसां किया बेहद
पेश आया मुझसे बड़े ही इज्जत से।

लबसे तेरे हय शोख़ गालियाँ जाना
बस रहे हम ता-उम्र सुन ते लज्ज़त से।

बारहाँ पटके है उसी के दर पे सर
बाज आये ना हम खुदाया उल्फ़त से।

********************************************
मौलिक व् अप्रकाशित (c) ‘जान’ गोरखपुरी
********************************************

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Comment

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Comment by jaan' gorakhpuri on March 23, 2015 at 12:02am

आ० प्रतिभा त्रिपाठी जी रचना पर मुक्त हृदय से सराहना के किये बहुत बहुत आभार!!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 19, 2015 at 10:27pm

आदरणीया निधि अग्रवाल जी हौसलाफजाई के लिए तहेदिल से शुक्रिया!आभार!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 19, 2015 at 10:25pm

आ० vijai shanker जी रचना प्र आपकी उपस्थिति मन हर्षित करती है!स्नेह बनाये रखे! बहुत बहुत आभार!सादर!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 19, 2015 at 10:24pm

आ० shyam mathpal जी हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया!आभार!!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 19, 2015 at 10:23pm

आदरणीय Hari Prakash Dubey बहुत बहुत आभार! स्नेह बनाये रखें!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 19, 2015 at 10:21pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आपकी सरहना से मन हर्षित हुआ,रचनाकर्म सार्थक हुआ!बहुत बहुत आभार!!सादर.

Comment by jaan' gorakhpuri on March 19, 2015 at 10:18pm

भाई महर्षि ! रचना पर आपकी प्रतिक्रिया और उत्साहवर्धन के लिए आभार!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 19, 2015 at 10:14pm

Shyam Narain Verma जी सराहना के लिए बहुत बहुत आभार!!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 19, 2015 at 10:13pm

आ०लक्ष्मण रामानुज लडीवाला जी हौसलाफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!आभार!!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 19, 2015 at 10:10pm

आदरणीय गिरिराज सर जी! रचना पर आपका विश्लेषण पाकर मन हर्षित हुआ!!बहुत बहुत आभार!

>>जहाँ तक बात है स्वाभाविक प्रवाह की,तो बहर में लिखना शुरू ही किया है! धीरे धीरे प्रवाह बनता जायेगा!!

>>बहर को निभाहने की जहाँ तक बात है तो पहले मै अपनी रचना को स्वतः जस के तस जैसे मन में शब्दों की गिरह लगती जाती है अपनी धुन में लिखता हूँ!फिर उनको मात्रा के हिसाब से किस बहर में लिखी जा सकती है या रक्खी जा सकती है के अनुरूप ढालने का प्रयास करता हूँ!जिससे कुछ बनावट गजल में स्वाभाविक तौर पर आ जाती है!गुरुवर और कोई तरीका हो तो बतायें!

>>कुछ दिन पहले किसी बहर को चुन कर उस पर लिखने का प्रयास सीखने के तहत किया था!आपकी पारखी नजर ने यह बात वहीँ पकड़ी है! पर इस गजल के सम्बन्ध में ऐसा कुछ नही है के पहले से निश्चित बहर में मैंने शब्द भरे हों!

>>कुछ शब्द को जानबूझकर ऐसे मैंने लिखा है जैसे अदाकारा को अदाकारां ध्वनी तरन्नुम में करने के लिए//शर्मसार को शर्मसां बाबहर करने के लिए(शब्दों को बाबह्र करने के लिए परिवर्तन तो अकसर देखने में मिल जाते है जैसे मुहब्बत/मोहब्बत/महोब्बत)//बारहाँ  तो कई  दीवान में छपा देखा है इसलिये वैसा लिखा!!

आदरणीय हर रचना अपनी पूरी निष्ठा से और जितना संभव हो उस समय देकर ही प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूँ!!

सीखने के सन्दर्भ में बीच में कुछ अपरिपक्व रचनाये अवश्य प्रस्तुत की थी! पर हर रचना में अपना १००% रखने का प्रयास रहता है

बाकी जो भी कमी है वो मेरी अल्पबुद्धि का परिणाम है,वख्त के साथ शायद वो दूर होती जायें!

आदरणीय सरजी इसी प्रकार अपना स्नेह व् मार्गदर्शन बनाये रखें!!

                                                           

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