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मिटा दूँ या मिट जाऊँ -- अतुकांत ( गिरिराज भण्डारी )

मिटा दूँ या मिट जाऊँ

-----------------------

कब से भटक रहा हूँ

कभी पानी हुये

तो कभी खुद को नमक किये 

कोई तो मिले घुलनशील

या घोलक

घोल लूँ या घुल जाऊँ ,

समेट लूँ

अपने अस्तित्व में या

एक सार हो जाऊँ , किसी के अस्तित्व संग

विलीन कर दूँ ,

खुद को उसमें

या कर लूँ ,

उसको खुद में

भूल कर अपने होने का अहम

और भुला पाऊँ किसी को

उसके होने को   

ख़त्म हो जाये दोनों का ठोस पन

ज़ाहिर हो वास्तविक तरलता

बचे बस प्रेम

बहे बस प्रेम

इस क्षितिज से उस क्षितिज तक

भर जाये ,

लबालब ॥

******************************* 

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 11, 2015 at 4:39pm

आदरणीया  बड़े भाई गोपाल जी , रचना की भाव भूमि के अनुमोदन के लिये आपका आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 11, 2015 at 4:36pm

आदरणीया मंजरी जी , सराहना के लिये आपका आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 11, 2015 at 4:36pm

आदरणीय नीरज भाई , रचना के अनुमोदन के लिये आपका शुक्रिया ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 11, 2015 at 11:54am

आ० अनुज

भारतीय दर्शन  में जो सायुज्य मुक्ति है उसकी याद दिलाती रचना i  सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 11, 2015 at 11:52am

घोल लूँ या घुल जाऊँ ,

समेट लूँ

अपने अस्तित्व में या

एक सार हो जाऊँ , किसी के अस्तित्व संग

विलीन कर दूँ ,

खुद को उसमें

या कर लूँ ,

उसको खुद में------------------अनुज भंडारी जी  i  भारतीय दर्शन में चार प्रकार की मुक्तियाँ मानी गयी हैं ,जिनमे सर्वोपरि है -सायुज्य  i इसमें जीव परमात्मा के अस्तित्व में लीन और विलीन  हो जाता है i फिर वह भव बंधन से मुक्त हो जाता है i आपकी कविता  उसी की याद  दिलाती है i सादर i

Comment by mrs manjari pandey on March 11, 2015 at 11:41am

आदरणीय गिरिराज जी रोज़मर्रा के अहसासों को बखूबी बयान किया आपने । हार्दिक बधाई । 

Comment by Neeraj Neer on March 11, 2015 at 9:03am

बचे बस प्रेम

बहे बस प्रेम

इस क्षितिज से उस क्षितिज तक

भर जाये ,

लबालब ॥.... बहुत सुंदर ......प्रेम ही प्रथम एवं आखिर सत्य है .... सुंदर रचना॥ हार्दिक बधाई। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 10, 2015 at 10:10pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , रचना की सराहना के लिये अपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 10, 2015 at 10:09pm

आदरणीरा राजेश जी , रचना के भाव का अनुमोदन के लिये आपका आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 10, 2015 at 10:08pm

आदरणीय खुर्शीद भाई , रचना के भाव आपको पसंद आये , हार्दिक खुशी हुई , आपका तहे दिल से शुक्रिया ।

कृपया ध्यान दे...

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