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‘दो टिकट बछरावां के लिए’ –मैंने सौ का नोट देते हुए बस कंडक्टर से कहा I

‘टूटे दीजिये, मेरे पास चेंज नहीं है I’

‘कितने दूं ?’

‘बीस रुपये ‘

   मैंने उसे बीस रूपए दे दिये और पर्स सँभालने में व्यस्त हो गया I वह रुपये लेकर आगे बढ़ गया I

-'क्या कंडक्टर ने टिकट दिया ?'- सहसा मैंने पत्नी से पूछा i

‘नहीं तो ‘ उसने चौंक कर कहा I  तभी बगल की सीट पर बैठा एक अधेड़ बोल उठा –‘टिकट भूल जाइये साहेब , बछरावां के दो टिकट तीस रुपये के हुए उसने आपसे बीस ही तो लिए i दस का फायदा आपका और बीस का उसका I गौरमेंट की ऐसी-तैसी I’

 

(मौलिक व् अप्रकाशित )     

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 23, 2015 at 7:03pm

विजय सर !

आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया का आभार i

Comment by विनय कुमार on February 23, 2015 at 5:51pm

रोज ही दो चार होते हैं लोग ऐसे वाकयों से लेकिन मूल बात वही " सरकार की ऐसी की तैसी "| सुन्दर लघुकथा , बधाई..

Comment by Satyanarayan Singh on February 23, 2015 at 3:30pm

भ्रष्टाचार के कई रूप होते है  उसके  एक रूप  की झलक इस लघु कथा में देखने को मिलती है . इस सफल लघुकथा हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें. आ. डॉ. गोपाल नारायन जी 

Comment by khursheed khairadi on February 23, 2015 at 9:15am

आदरणीय गोपालनारायण सर ,बहुत जीवंत व्यंग्य है |सिस्टम में अनजाने ही हम सब ढल चुके है |कटु सत्य |हार्दिक बधाई |सादर अभिनन्दन |

Comment by Hari Prakash Dubey on February 23, 2015 at 2:26am

आदरणीय डॉo गोपाल नारायण सर ,तीर सीधे निशाने पर मारा है . “गौरमेंट की ऐसी-तैसी” सुन्दर रचना , हार्दिक बधाई ! सादर .

Comment by maharshi tripathi on February 22, 2015 at 6:17pm

बहुत सुंदर जीवंत उदाहरण ,,,इस अच्छी लघुकथा पर आपको सादर बधाई आ. गोपाल नारायण जी |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 22, 2015 at 4:10pm

सहभागिता आधारित भ्रष्टाचार पर सटीक व्यंग्य 

सफल लघुकथा पर हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर.

Comment by Shubhranshu Pandey on February 22, 2015 at 12:27pm

इसे ही कहते है करप्शन विथ कापरेशन 

सुन्दर कथा. 

सादर.

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 22, 2015 at 11:46am
जय हो, सहभागिता इसी को कहते हैं।
क्या कहें, कितना कहें, किस से कहें.
फिलहाल संज्ञान के लिए कहानी अच्छी है, बधाई , आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी, सादर।

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