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आखिर क्यों मैं ऐसा हूँ ..... ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

22--22--22--22--22--22--22--2

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हँसते - हँसते  रो  लेता  हूँ,   रोते - रोते  हँसता  हूँ

कोई मुझसे  ये मत पूछो आखिर क्यों  मैं  ऐसा हूँ

 

आईने-सी  शक्ल  बना कर  इक नुक्कड़ पर बैठा हूँ

कितने उजले,  कितने काले, चेहरे गिनते रहता हूँ

 

ऐसा होगा,  वैसा होगा,   आज  हुकूमत   बदलेगी

अपनी तो औकात  ज़रा-सी, सबकी बातें सुनता हूँ

 

दिल का मतला, दर्द काफिया, छोटी बह्र है जीवन की

सिर्फ अक़ीदत के लफ्जों से, सादी गज़लें लिखता हूँ

 

गम की दुनिया अपने भीतर, यारां ऐसे  कैद न कर

अपना गम  मुझको बतला दे, मैं  भी  तेरे  जैसा हूँ

 

सूरज, चाँद, सितारे, लोरी,  खेल-खिलौने  छूट  गए

फिर से ये सब मुझे दिलाओ  मैं  भी छोटा बच्चा हूँ

 

घर का ये आँगन लगता है जनम-जनम का प्यासा है

जब भी आता-जाता घर में, पाँव  भिगोकर चलता हूँ

 

दिल की बाते आज सितारों को बतला के चैन मिला

पलकों से बादल-सा उतरा,  खूब झमाझम बरसा हूँ

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment

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Comment by दिनेश कुमार on February 9, 2015 at 4:48pm
आप ने बहुत उच्च कोटि की ग़ज़ल कही है भाई मिथिलेश जी, पहले शे'र से ही जो समाँ बंधा है, वह आखिरी शे'र को पढ़ने के बाद भी खत्म नहीं हो रहा .... शब्दों में इतना आकर्षण पैदा हुआ है। मेरे पास प्रशंसा के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं। कुछ बह्र का कमाल भी है। अद्वितीय। वाह
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 9, 2015 at 4:01pm

दिल का मतला, दर्द काफिया, छोटी बह्रे जीवन की

सिर्फ अक़ीदत के लफ्जों से, सादी गज़लें लिखता हूँ........वाह! बहुत खूब. बस! यही सादगीपूर्ण हलफनामा आपकी गजलों को आकर्षक बनाता है. फिर से एक सहज गजल पढने को मिली. दिली बधाई ,आदरणीय मिथिलेश जी.

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 9, 2015 at 2:38pm
दिल का मतला, दर्द काफिया, छोटी बह्रे जीवन की

सिर्फ अक़ीदत के लफ्जों से, सादी गज़लें लिखता हूँ

बहुत खूब ग़ज़ल हुई है सर जी
Comment by anand murthy on February 9, 2015 at 11:38am

bahut hi sundar gazal bnii   shreemaan

haardik shubhkaamnaye

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 9, 2015 at 10:56am
बहुत ही साफ़ , सरल, सुबोध रचना, बधाई , प्रिय मिथिलेश जी, सादर।

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