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आखिर क्यों मैं ऐसा हूँ ..... ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

22--22--22--22--22--22--22--2

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हँसते - हँसते  रो  लेता  हूँ,   रोते - रोते  हँसता  हूँ

कोई मुझसे  ये मत पूछो आखिर क्यों  मैं  ऐसा हूँ

 

आईने-सी  शक्ल  बना कर  इक नुक्कड़ पर बैठा हूँ

कितने उजले,  कितने काले, चेहरे गिनते रहता हूँ

 

ऐसा होगा,  वैसा होगा,   आज  हुकूमत   बदलेगी

अपनी तो औकात  ज़रा-सी, सबकी बातें सुनता हूँ

 

दिल का मतला, दर्द काफिया, छोटी बह्र है जीवन की

सिर्फ अक़ीदत के लफ्जों से, सादी गज़लें लिखता हूँ

 

गम की दुनिया अपने भीतर, यारां ऐसे  कैद न कर

अपना गम  मुझको बतला दे, मैं  भी  तेरे  जैसा हूँ

 

सूरज, चाँद, सितारे, लोरी,  खेल-खिलौने  छूट  गए

फिर से ये सब मुझे दिलाओ  मैं  भी छोटा बच्चा हूँ

 

घर का ये आँगन लगता है जनम-जनम का प्यासा है

जब भी आता-जाता घर में, पाँव  भिगोकर चलता हूँ

 

दिल की बाते आज सितारों को बतला के चैन मिला

पलकों से बादल-सा उतरा,  खूब झमाझम बरसा हूँ

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment by मिथिलेश वामनकर on February 14, 2015 at 1:45am

आदरणीय खुर्शीद सर के मार्गदर्शन पश्चात् ग़ज़ल सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 12, 2015 at 10:06pm
सराहना के लिए हार्दिक आभार आदरणीय उमेश जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 12, 2015 at 7:49pm
आदरणीय उमेश कटारा जी सकारात्मक प्रतिक्रिया औरसासराहा के लिए हार्दिक आभार।र
Comment by umesh katara on February 12, 2015 at 6:10pm

घर का ये आँगन लगता है जनम-जनम का प्यासा है

जब भी आता-जाता घर में, पाँव  भिगोकर चलता हूँ
वाहहहहहहहह 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 12, 2015 at 12:57pm
आदरणीय गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया और स्नेह मिलता है तो रचनाकर्म को बहुत बल मिलता है। हृदय से आभार। नमन।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 12, 2015 at 12:55pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी ग़ज़ल के अनुमोदन पाकर अच्छा लगा। धन्य हुआ।सकारात्मक प्रतिक्रिया से लिखना सार्थक हुआ। हृदय से आभारी हूँ। नमन
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 12, 2015 at 11:38am

दिल का मतला, दर्द काफिया, छोटी बह्रे जीवन की

सिर्फ अक़ीदत के लफ्जों से, सादी गज़लें लिखता हूँ

 

गम की दुनिया अपने भीतर, यारां ऐसे  कैद न कर

अपना गम  मुझको बतला दे, मैं  भी  तेरे  जैसा हूँ

दिल की बाते आज सितारों को बतला के चैन मिला

पलकों से बादल-सा उतरा,  खूब झमाझम बरसा हूँ

    बेहतरीन मिथिलेश जी i आपको  सादर बधाई  i

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 12, 2015 at 10:29am

आईने-सी  शक्ल  बना के  इक नुक्कड़  पे  बैठा हूँ

कितने उजले,  कितने काले, चेहरे गिनते रहता हूँ------गिनता करलें ----बहुत ही उम्दा शेर 

गम की दुनिया अपने भीतर, यारां ऐसे  कैद न कर

अपना गम  मुझको बतला दे, मैं  भी  तेरे  जैसा हूँ------बेहद  खूबसूरत शेर 

दिल की बाते आज सितारों को बतला के चैन मिला

पलकों से बादल-सा उतरा,  खूब झमाझम बरसा हूँ---दिल छू गया शेर 

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई ,देर से पढने का खेद है 

ढेरों दाद कबूलिये मिथिलेश जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 12, 2015 at 2:28am

 ग़ज़लों में आपके सुझाये  हिंदी के अष्टक नियम वाकई कमाल के है |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 12, 2015 at 12:07am

आदरणीय खुर्शीद सर, आपके मार्गदर्शन अनुसार शीघ्र संशोधन करता हूँ. सादर  

कृपया ध्यान दे...

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