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वो कातिल शोख नजरों से पिलाती है दिवाली में

तरही ग़ज़ल 

नयी उम्मीद की किरने जगाती है दिवाली में 

वो नन्ही जान जब दीपक जलाती है दिवाली में 

अगर हो हौसला दिल में तो तय है मात दुश्मन की 

जला के खुद को बाती ये सिखातीहै दिवाली में 

बताशे खील खिलते फूल दीपक झिलमिलाते यूं 

नहीं मुफलिस को यादे गम सताती है दिवाली में 

दियों का नूर चेहरे पर चले बल खा के शरमा के 

वो कातिल शोख नजरों से पिलाती है दिवाली में 

है रुत बहकी, हवा महकी, अजब दिलकश नज़ारा है 

फिज़ाएं नूर की चादर बिछाती हैं दिवाली में 

मुझे अफ़सोस हरदम ही रहा है दोस्तों इसका 

क्यूँ जनता आग पैसों में लगाती है दिवाली में 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by गिरिराज भंडारी on February 7, 2015 at 12:05pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है , आदरणीय आशुतोष भाई , सभी अशआर लाजवाब हैं । आपको दिली मुबारकबाद प्रेषित करता हूँ । गिरह भी बहुत सुन्दर लगाई है !! बधाई भाई जी ।

Comment by khursheed khairadi on February 7, 2015 at 11:26am

दियों का नूर चेहरे पर चले बल खा के शरमा के 

वो कातिल शोख नजरों से पिलाती है दिवाली में 

आदरणीय आशुतोष जी उम्दा ग़ज़ल हुई है |ढेरों दाद कबूल फरमावें |सादर अभिनन्दन |

Comment by Shyam Narain Verma on February 7, 2015 at 10:11am
बेहद उम्दा ...बहुत बहुत बधाई आप को आदरणीय | सादर 
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 7, 2015 at 9:36am
क्यूँ जनता आग पैसों में लगाती है दिवाली में
स्वागत -लक्ष्मी , जो दौलत लाती है दीवाली में
बहुत सुन्दर ग़ज़ल बनी है आदरणीय डॉ o आशुतोष मिश्रा जी , बधाई, सादर।
Comment by सर्वेश कुमार मिश्र on February 7, 2015 at 7:58am

उम्दा ग़ज़ल... Dr Ashutosh Mishra साहब बधाई...

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