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" क्या हुआ सलीम साहब , चेहरा इतना उतरा हुआ क्यूँ है ? कहीं फिर इस बार टिकट का मसला तो नहीं फंस गया "|
" नहीं , कुछ नहीं , बस यूँ ही तबीयत कुछ नासाज़ लग रही है "| टाल तो दिया उन्होंने लेकिन अंदर ही अंदर कुछ खाए जा रहा था | पिछली बार भी यही हुआ था , आखिरी समय तक आश्वासन मिलता रहा था कि सीट आपकी पक्की है , इस बार भी उम्मीद नहीं दिख रही |
अगले दिन उन्होंने अख़बारों में खबर छपवा दी " सलीम साहब ने अपनी पार्टी का टिकट ठुकराया "| शाम तक उनको दूसरी पार्टी ने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया |
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on January 28, 2015 at 11:06am

बहुत बहुत आभार आदरणीय विजय जी..

Comment by विनय कुमार on January 28, 2015 at 11:05am

बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ विजय शंकर जी..

Comment by विनय कुमार on January 28, 2015 at 11:05am

बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी..

Comment by विनय कुमार on January 28, 2015 at 11:03am

बहुत बहुत आभार आदरणीय सोमेश कुमार जी ..

Comment by vijay on January 28, 2015 at 9:52am
वाह वाह क्या बात है
Comment by Hari Prakash Dubey on January 28, 2015 at 9:20am

आदरणीय विनय जी हार्दिक  बधाई  इस लघुकथा पर !

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 28, 2015 at 2:14am
अंगूर पहुंच के बाहर थे , खट्टे बता दिए ,
रसभरी का टोकरा लिए दूसरे खड़े मिले ॥
बधाई , आदरणीय विनय जी, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 28, 2015 at 1:43am

हा हा हा.... जोरदार प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई. अच्छी खबर ली आपने दल-बदलुओं की इस लघुकथा के माध्यम से.

Comment by somesh kumar on January 27, 2015 at 10:59pm

यही है दल-बदलुओं का दाँव-पेंच |सम-सामयिक विषय पर सुंदर प्रस्तुति 

कृपया ध्यान दे...

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