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मेरा जीवन पी  गया, तेरी कैसी प्यास ।

पनघट से पूछे नदी, क्यों तोड़ा विश्वास ।१।

                 

मन में तम सा छा गया, रात करे फिर शोर।

दिनकर जो अपना नहीं, क्या संध्या क्या भोर ।२।

                 

बैठे बैठे रो रही, बरगद की अब छाँव ।

कौन चुराकर ले गया, पंछी वाला गाँव ।३।

                 

नटखट को फटकारियें, सोचें उसके बाद ।

जायेगी किस पे भला, अपनी है औलाद ।४।

                 

कच्चा मन! कच्ची उमर ! उफ़ टूटे जब ख्वाब ।

बित्ते भर रूमाल में,....... मुट्ठी भर सैलाब ।५।

                 

अपना घर करने लगा, अपना ही अपमान ।

दस्तक सुनकर मौन है,....दीवारों के कान ।६।

                 

एक अकेले प्रश्न पर,  सारी गलियाँ मौन ।

पूछ रहा है वक्त भी,... राह दिखाएँ कौन ।७।

                 

उजड़े से सब खंडहर,....... कहते है इतिहास ।

सोच समझ के कीजिये, अपनों पर विश्वास ।८।

 

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 3, 2015 at 6:38pm

परम  आदरणीय sharadindu mukerji सर, रचना पर आपकी उपस्थिति से ही बहुत मान बढ़ गया मेरा. सराहना और आशीर्वाद के लिए हार्दिक आभार. नमन.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on February 3, 2015 at 5:12pm
अद्भुत....अद्भुत.....आश्चर्यजनक ढंग से सुंदर दोहावलियाँ. आदरणीया डॉ प्राची जी की टिप्पणी ने इस रचना को और प्रगाढ़ किया है. हार्दिक साधुवाद माननीय मिथिलेश जी.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 15, 2015 at 8:20pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय हरिप्रकाश जी 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 15, 2015 at 8:12pm

मेरा जीवन पी  गया, तेरी कैसी प्यास ।

पनघट से पूछे नदी, क्यों तोड़ा विश्वास .....इस परिवर्तन के साथ संपूर्ण रचना ही सुन्दर है, आदरणीय मिथिलेश जी  पुनः हार्दिक बधाई आपको !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 15, 2015 at 7:38pm

आदरणीया छाया शुक्ला जी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 15, 2015 at 7:36pm

आदरणीय गिरिराज सर, दोहावली पर आपके स्नेह और सराहना के लिए हार्दिक आभार, धन्यवाद.

Comment by Chhaya Shukla on January 15, 2015 at 6:56pm

आदरणीय , मिथिलेश वामनकर जी
भरपूर मारक क्षमता से सजे इन दोहों की बधाई स्वीकारें |

सादर नमन !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 15, 2015 at 8:27am

बैठे बैठे रो रही, बरगद की अब छाँव ।

कौन चुराकर ले गया, पंछी वाला गाँव ।३।

कच्चा मन! कच्ची उमर ! उफ़ टूटे जब ख्वाब ।

बित्ते भर रूमाल में,....... मुट्ठी भर सैलाब ।५।

आदरणीय मिथिलेश भाई , लाजवाब दोहावली के लिये बधाइयाँ । ऊपर के दोहों का तो कहना ही क्या , वाह । अनेकों बधाइयाँ ।

                 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 15, 2015 at 8:08am

आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी आपकी दोहावली पर विस्तृत, सार्थक और स्नेहपूर्ण प्रतिक्रिया पाकर अभिभूत हूँ. आपके मार्गदर्शन अनुसार दोहावली  संशोधित करता हूँ.  मार्गदर्शन और सराहना के लिए हृदय से आभारी हूँ। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 15, 2015 at 8:03am

आदरणीय शिशिर द्धिवेदी जी बहुत बहुत धन्यवाद, हार्दिक आभार। 

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