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अपने  वज़ूद  की  ख़बर   इस तरह  हम  देते हैं
मुट्ठी  में  रेत उठाकर  हम  हवा  में उड़ा देते हैं


क्या हुआ जो  इस  उम्र में  हम बे-समर हो गए
ये शज़र आज भी  गुज़री  बहारों  की हवा देते हैं


अब हंसी भी  लबों पे  पैबंद  सी  नज़र  आती हैं
जाने लोग आँखों में कैसे नमी को  छुपा  लेते हैं


रुख से चिलमन उठते ही नज़रें भी बहकने लगी
हम भी बेजुबानों की तरह पैमाने को उठा लेते हैं


जागते  रहे  तमाम  शब्  हम  उसके इंतज़ार में
बार बार  चरागों  को  हम जलने की सज़ा देते हैं 


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on December 22, 2014 at 4:22pm

आदरणीय  Hari Prakash Dubey    जी रचना पर आपके स्नेह का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on December 22, 2014 at 4:21pm

आदरणीय डॉ गोपाल नरायन श्रीवास्तव जी रचना पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। गीतिका पर आपके द्वारा बताई गयी संरचना से मैं पूर्णतः सहमत हूँ। किन्तु किसी विद्वान सहयोगी ने गीतिका के बारे में जो बताया उसके अनुसार गीतिका पुराना गीतिका छंद या हरिगीतिका नहीं है। ये ग़ज़ल से मिलती जुलती है किन्तु ग़ज़ल के नियमों से मुक्त है। इसमें कम से कम पाँच युग्म अवश्य हों .पहले युग्म की दोनों पंक्तियाँ समांत पर और बाद के प्रत्येक युग्म की दूसरी पंक्ति का समांत प्रथम युग्म के समान्त जैसा ही होगा जबकि पहली पंक्ति अतुकांत होगी l प्रत्येक युग्म की अभिव्यक्ति स्वतंत्र होगी !
इसी भाव को ध्यान में रखकर मैंने इस ग़ज़ल रूपी गीतिका को रचा। इसीलिये मैंने इसे गीतिका का नाम भी दिया।' फ्री वर्स' से आपका क्या अभिप्राय है आदरणीय। अगर आप इसे गीतिका की श्रेणी में नहीं रखते तो मैं इसे स्वतन्त्र अभिव्यक्ति भी कहा जा सकता है। वैसे आपका सुझाव और मार्गदर्शन मेरे लिए अमूल्य हैं। सुझावात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार। कृपया स्नेह बनाये रखें।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 22, 2014 at 1:40pm

सरना जी

बहुत  बेहतरीन लिखा आपने  i पर  मान्यवर यह गीतिका नहीं है i गीतिका में मात्रा  (14 ,12 ) होती है  i  मुट्ठी  में रेत  उठाकर -----इस पंक्ति में 30 मात्राएँ हैं i यह आपकी फ्री वर्स है i भाव की दृष्टि से बहुत सबल है  i

क्या हुआ जो  इस  उम्र में  हम बे-समर हो गए
ये शज़र आज भी  गुज़री  बहारों  की हवा देते हैं


अब हंसी भी  लबों पे  पैबंद  सी  नज़र  आती हैं
जाने लोग आँखों में कैसे नमी को  छुपा  लेते हैं

Comment by Sushil Sarna on December 22, 2014 at 1:21pm

आदरणीय  मिथिलेश वामनकर जी रचना पर आपकी आत्मीय प्रशंसा ने मेरी लेखनी को जो मान दिया है उसके लिए बंदा आपका शुक्रगुज़ार है। बाकी रही बहर की बात तो इसे आप गीतिका ही मानें तो ठीक होगा। क्योँकि बहर के जाल में मैं उलझ जाता हूँ।

Comment by Hari Prakash Dubey on December 22, 2014 at 1:18pm

रुख से चिलमन उठते ही नज़रें भी बहकने लगी 
हम भी बेजुबानों की तरह पैमाने को उठा लेते हैं.....आदरणीय सुशील सरना जी इस रचना पर हार्दिक बधाई !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 22, 2014 at 9:29am

आदरणीय सुशील सरना जी सुन्दर भावों से सजी रचना के बेहतरीन प्रयास के लिए बधाई 

एक निवेदन है यदि ये ग़ज़ल है तो कृपया बहर अवश्य लिख देवे, हम जैसे पाठकों के लिए बड़ी परीक्षा हो जाती है. सादर 

कृपया ध्यान दे...

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