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2122  2122

ये भी जीने की अदा है

ग़म खुशी में मुब्तला है

 

रात भी है चाँद भी और

चाँदनी की ये रिदा है

 

नेस्त हो जाएगा इक दिन

रेत पर जो घर बना है

 

हादसों के दरमियाँ इक

ज़िन्दगी का सिलसिला है

 

मखमली सा लम्स तेरा

सर्द जैसे ये सबा है

 

तुझमें है यूँ अक्स मेरा

तू कि जैसे आइना है

 

मैं नहीं तन्हा सफ़र में

साथ अपनो की दुआ है

 

छोर पर नाकामियों के

मंज़िलों का रास्ता है

 

साँस ही है इब्तिदा और

साँस ही तो इंतिहा है

 

नाखुशी ज़ाहिर करो तुम

दिल जलाना क्या बजा है

 

क्या कहूँ मैं क्या लिखूँ अब

चश्मे नम से क्या दिखा है

(रिदा= चादर, नेस्त= ध्वस्त, लम्स= स्पर्श, बजा= ठीक)

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 21, 2014 at 9:14am

आदरणीया मंजरी जी रचना को समय देने एवं सराहना के लिये मैं आपका तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ

Comment by mrs manjari pandey on December 17, 2014 at 9:52pm
आदरणीय शिज्जु शकूर जी एक अच्छी ग़ज़ल । बधाई ।

ये भी जीने की अदा है
ग़म खुशी में मुब्तला है

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 16, 2014 at 6:00pm

आदरणीय गिरिराज सर आपका हार्दिक आभार


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 16, 2014 at 6:00pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर आपका हार्दिक आभार


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Comment by गिरिराज भंडारी on December 16, 2014 at 9:43am

हादसों के दरमियाँ इक

ज़िन्दगी का सिलसिला है  - सत्य वचन ! बहुत खूब आ. शिज्जु भाई , गज़ल के लिये दिली बधाई ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 15, 2014 at 8:05pm
बहुत सुन्दर ग़ज़ल ,
क्या कहूँ मैं क्या लिखूँ अब
चश्मे नम से क्या दिखा है ॥
बधाई , आदरणीय शिज्जु शकूर जी। सादर।

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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 15, 2014 at 7:37pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण सर ये आपका स्नेह है जो इतना मान दे रहें मैं जो भी लिखता हूँ बस आप सभी का आशीष होता है। आपका हार्दिक आभार


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 15, 2014 at 7:35pm

आदरणीय अजय शर्मा जी ये आपका स्नेह है, शुक्रिया आपका


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 15, 2014 at 7:34pm

आदरणीय मिथिलेश जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 15, 2014 at 7:34pm

आदरणीय गुमनाम जी रचना की सराहना के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ

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