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शिकायतें (लघुकथा)

"गुप्ता की बहुत शिकायतें आ रहीं हैं. लगता है इसका ट्रांसफर करना ही पड़ेगा। "
"लेकिन सर, वह तो नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पोस्टेड है। "
"अच्छा-अच्छा ! तब तो ट्रांसफर करवाने के लिए खुद ही शिकायतें भेज रहा होगा। सारी शिकायतें कचरे के डिब्बे में डाल दो।"

.

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2014 at 11:44am

परिस्थितियां किस प्रकार हमारी मानसिकता को बदल देती हैं इस लधुकथा के द्वारा उत्तम प्रकार से प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक वधाई स्वीकारे आदरणीय श्रद्धा जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 11, 2014 at 8:55pm

बहुत बढ़िया कटाक्ष वाह्ह्ह .हार्दिक बधाई इस लघु कथा पर|श्रद्धा जी  

Comment by भुवन निस्तेज on December 11, 2014 at 1:47pm
अरे वाह!
Comment by gumnaam pithoragarhi on December 9, 2014 at 6:38pm

वाह खूब अच्छा कहा है

Comment by Shraddha Thawait on December 9, 2014 at 4:26pm

उत्साहवर्धन के लिए आप सभी सुधीजनों को बहुत- बहुत धन्यवाद! अर्चना तिवारी जी, श्री श्याम नारायण वर्मा जी, श्री जवाहर लाल सिंह जी, श्री मिथिलेश वामनकर जी, श्री सोमेश कुमार जी, श्री गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी, श्री योगराज प्रभाकर सर.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 9, 2014 at 2:32pm

सरकारी दफ्तरी मानसिकता पर करारा प्रहार किया है श्रद्धा जी, बधाई प्रेषित है।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 9, 2014 at 1:41pm

श्रृद्धा जी

कार्यालय  की कार्य प्रणाली पर चोट करती है यह लघु कथा i  सुन्दर् कथा i

Comment by somesh kumar on December 9, 2014 at 10:01am

सच्चे-झूठे एक से लोग 

भरे-ठुठे एक से लोग 

जुड़े टूटे एक से लोग 

माने-रूठे एक से लोग 

सच है ,जहाँ सच वो भी कचरे में डाल दिय जाता है |बेहतरीन कलई खोलती लघुकथा


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 9, 2014 at 12:26am

बेहतरीन लघुकथा... बधाई 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on December 8, 2014 at 9:35pm

कम शब्दों में बड़ी बात! सार्थक लघुकथा!

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