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एक ग़ज़ल आपके हवाले

उल्टा सीधा बोल रही है दुनिया मेरे बारे में,
अखबारों ने छापा क्या कुछ, पढना मेरे बारे में.  
.

इस दुनिया में मिल न सकेंगे अगली बार मिलेंगे हम,
अर्श को जो भी अर्ज़ी भेजो, लिखना मेरे बारे में.
.

उनकी ज़ात से वाक़िफ़ हूँ, वो बाज़ नहीं आने वाले,
सर पर लेकर घूम रहे हैं फ़ित्ना मेरे बारे में.     
.

अपने दिल में एक दीया तुम मेरे नाम जला रखना, 
आँधी जाने सोच रही है क्या क्या मेरे बारे में.
.

मज्लिस से बाहर कर बैठे, उनकी जान में जाँ आई,
लेकिन अब भी सब करते हैं चर्चा मेरे बारे में.  
.

तुमको मैंने कब तुम माना, तुम थे मेरा असली “मैं”,
झूठ कहा था तुमने मुझसे कितना मेरे बारे में.  
.

सतरंगी से ताने बाने, रब्त बुने कुछ मैंने भी,
उसने भी क्या डाल रखा था करघा मेरे बारे में.
.

जोड़ा ‘नूर’ के हर्फ़ों को तो मेरा अक्स उभर आया,
इतना कैसे जान गया वो पगला मेरे बारे में.
.
निलेश "नूर"
मौलिक व् अप्रकाशित 

Views: 729

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 23, 2014 at 11:02am

नीलेश जी

बेहतरीन i सुन्दर i उम्दा i जायकेदार i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 22, 2014 at 11:59pm

बहुत सुंदर

Comment by somesh kumar on October 22, 2014 at 10:08pm

good

Comment by Aditya Kumar on October 22, 2014 at 7:48pm

badhiya....

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