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शोकाग्नि का भोज (लघुकथा)

जवान बेटा मरा था उसका I मातम फैला हुआ था परिवार में, परिवार के हरेक सदस्य में, सदस्यों के दिलों में I लेकिन, श्राद्धकर्म तो करना ही पड़ेगा, गाँववासियों को भोज तो खिलाना ही पड़ेगाI

आज उसी का भोज है I लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जले हैं I  भोज है, जबकि एक घर शोकाग्नि में तप रहा हैं और इसी तपन पर ऊफन रहा है - चावल, दाल, सब्जी ...

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 4, 2014 at 11:21am

बहुत मार्मिक लघु कथा .बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 3, 2014 at 9:04pm

आदरणीय विवेक भाई , विषय बढ़िया चुना है , बधाई स्वीकार करें ! शिल्प के विषय में आ. बागी जी कहा ही चुके हैं |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 3, 2014 at 8:57am

विवेक जी, इस कृति को लघुकथा कहने में तनिक संकोच कर रहा हूँ, कुछ कुछ आलेख का अंश सा भान दे रहा है, इस प्रयास हेतु प्रोत्साहित करता हूँ , बधाई स्वीकार करें। 

Comment by Sulabh Agnihotri on October 2, 2014 at 8:58pm

अच्छा प्रयास है।
बधाई विवेक जी !

Comment by विनय कुमार on October 2, 2014 at 3:51pm

बहुत मार्मिक एवम सुन्दर लघुकथा विवेकजी | बहुत बहुत बधाई..

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