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कौन दे उल्लास मन को ? .. सुलभ अग्निहोत्री

कौन दे उल्लास मन को ? फिर वसन स्वर्णिम, किरन को ?
हो गये जो स्वप्न ओझल फिर दरस उनके नयन को ?

कोपलों पर पहरुये अंगार धधके धर रहे हैं
साधना कापालिकी उन्माद के स्वर कर रहे हैं
त्राहि मांगें अश्रु किससे, वेदना किसको दिखायें
कौन दे स्पर्श शीतल अग्निवाही इस पवन को ?

कोटि दुःशासन निरंतर देह मथते, मान हरते
द्रौपदी का आर्त क्रंदन अनसुना श्रीकृष्ण करते
नेह के पीयूष से अभिषेक कर फिर कौन दे अब
भाल को सौभाग्य कुमकुम, आलता चंचल चरन को ?

दिग्भ्रमित दिग्पाल सारे, भाल-नत नग-श्रंखलायें
नेत्र किसकी बाट जोहें, कण्ठ अब किसको बुलायें
वक्ष में घुमड़े घनों से, श्रान्त मन है, क्लान्त तन है
कौन आकर दे सकेगा कान्ति फिर धूसर गगन को ?

झुरमुटों को पुष्प मुकुलित, झुटपुटों को चन्द्रिका नव
आँधियों को मृदु समीरण, भीत खग को मुक्त कलरव
सृष्टि में मधु मोद भर के, हर्ष का अतिरेक भर के
कौन दे उत्साह, ऊर्जा, साधना-संचित सृजन को ?

------------------  मौलिक तथा अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 2, 2014 at 12:14pm

आदरणीय सुलभ जी इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by Pawan Kumar on September 30, 2014 at 11:03am

अनुपम प्रस्तुति के लिए सादर बधाई ..

Comment by harivallabh sharma on September 30, 2014 at 1:28am

बहुत ही उत्कृष्ट रचना आदरणीय सुलभ जी,कितने सारे प्रश्न हैं कि जिनके जबाब आज मिलते नहीं है...

झुरमुटों को पुष्प मुकुलित, झुटपुटों को चन्द्रिका नव
आँधियों को मृदु समीरण, भीत खग को मुक्त कलरव
सृष्टि में मधु मोद भर के, हर्ष का अतिरेक भर के
कौन दे उत्साह, ऊर्जा, साधना-संचित सृजन को ?............सुन्दर सृजन हेतु बधाई आपको.

Comment by Vivek Jha on September 29, 2014 at 4:53pm

बहुत ही उत्कृष्ट रचना है सुलभ जी, सुन्दर शब्दों के साथ भावसंपन्न इस कविता के लिए एक गीत है - तन भी सुन्दर मन भी सुन्दर, तुम सुन्दरता की मूरत हो" 

Comment by khursheed khairadi on September 29, 2014 at 8:13am

आदरणीय सुलभ जी अति सुन्दर रचना है |हार्दिक अभिनन्दन 

कोटि दुःशासन निरंतर देह मथते, मान हरते
द्रौपदी का आर्त क्रंदन अनसुना श्रीकृष्ण करते
नेह के पीयूष से अभिषेक कर फिर कौन दे अब
भाल को सौभाग्य कुमकुम, आलता चंचल चरन को ?

इस अंतरे पर कोटि  नमन आपकी कलम को 

सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 28, 2014 at 7:51pm

सुन्दर शब्दों का प्रयोग सुन्दर भाव ...बहुत खूबसूरत प्रस्तुति 

कोटि दुःशासन निरंतर देह मथते, मान हरते
द्रौपदी का आर्त क्रंदन अनसुना श्रीकृष्ण करते
नेह के पीयूष से अभिषेक कर फिर कौन दे अब
भाल को सौभाग्य कुमकुम, आलता चंचल चरन को ?----बहुत सही लिखा ---वक़्त  बदला संवेदनाएं बदली लुटती अबलायें आज गली गली यही सब तो हो रहा है कोई कृष्ण बचाने नहीं आता ..

हार्दिक बधाई आपको इस सार्थक प्रस्तुति पर आ० सुलभ  जी 

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