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चूस हाथों के अंगूठे नन्हा बचपन सो गया

२१२२    २१२२     २१२२      २१२ 

 

वो कहें सागर  में मिलकर आज दरिया खो गया 

हम कहें सागर से दरिया मिल के सागर हो गया 

 

सोच कुछ तेरी जुदा है सोच कुछ मेरी अलग

सोचिये सोचों का अंतर आज  कैसा हो गया

 

करते दंगों पे सियासत रहनुमा इस देश के 

देख कर अपनों की लाशें नन्हा बचपन रो गया 

 

दर्द पहले ही हज़ारों जिन्दगी में दोस्तों 

फिर नया ये दर्द क्यूँ जग जिन्दगी में बो गया 

 

माँ रही मशगूल जश्नों में यूं सारी रात ही 

चूस हाथों के अंगूठे नन्हा बचपन सो गया 

 

दर्द जब जब भी बढा है दिल हुआ बेचैन है 

ढाल शेरो में ग़मों को दिल ये ग़ज़लें पो गया 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by भुवन निस्तेज on August 28, 2014 at 10:58pm
करते दंगों पे सियासत रहनुमा इस देश के

देख कर अपनों की लाशें नन्हा बचपन रो गया


क्या बात है साहब बधाई हो...
Comment by भुवन निस्तेज on August 28, 2014 at 10:52pm
करते दंगों पे सियासत रहनुमा इस देश के

देख कर अपनों की लाशें नन्हा बचपन रो गया


क्या बात है साहब बधाई हो...
Comment by MAHIMA SHREE on August 28, 2014 at 9:21pm

बेहतरीन प्रस्तुती बहुत -२  बधाई आपको 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 28, 2014 at 12:56pm

धन्यवाद पवन जी ..

Comment by Pawan Kumar on August 28, 2014 at 12:40pm

बहुत सुन्दर प्रस्तुति .....
मार्मिक भाव झलकता है.....
सादर बधाई स्वीकारें...

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 28, 2014 at 12:06pm

आदरणीय सर ..आप सभी का स्नेह और मार्गदर्शन ही कुछ नूतन लिखने की सदैव उर्जा प्रदान करता है सादर धन्यवाद के साथ 

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 28, 2014 at 11:47am
क्या बात है , बहुत ही सुन्दर .
वो कहें सागर में मिलकर आज दरिया खो गया
हम कहें सागर से दरिया मिल के सागर हो गया ॥
बहुत बहुत बधाई इस आकर्षक रचना के लिए आदरणोय डॉo आशुतोष मिश्रा जी .

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