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‘ अकड़न ’  

*********

जहाँ कहीं भी अकड़न है

समझ लेने दीजिये उसे

अगर वो ये सोचती है कि, दुनिया है , तो वो है

तो ये बात सही भी हो सकती है

और अगर वो ये सोचती है कि , वो है, इसलिए दुनिया है

तो फिर उसे देखना चाहिए पीछे मुड़कर

कि, कोई भी नहीं बचा है , ऐसी सोच रखने वालों में से

और दुनिया आज भी है ,

वैसे तो तुम्हारा होना बस तुम्हारा होना ही है , इससे ज्यादा कुछ नहीं

बस एक घटना घटी और तुम हो गए

एक और घटेगी , तुम नहीं रहोगे 

तो पियो सरलता

आने दो तरलता , और बह जाने दो

फैल जाने दो ,

ता कि , दुनिया की पूरी सतह हो जाए आच्छादित

क्यों कि सरलता और तरलता ही फ़ैल सकती है, असीम

और हो जाने दो सार्थक

अपने होने की उस एक नगण्य घटना को ||

*****************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by ram shiromani pathak on August 14, 2014 at 12:42pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय गिरिराज जी ...........  सादर 

Comment by savitamishra on August 14, 2014 at 10:40am

अति सुन्दर रचना.....सादर नमस्ते भैया


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 14, 2014 at 8:15am

अकडन में विस्तार की संभावनाएं कहाँ...... अनंत विस्तार के लिए तो सरलता चाहिए तरलता चाहिए..... वाह बहुत खूबसूरत 

अपने होने के उस एक नगण्य घटना को..................शायद यहाँ की किया जाना चाहिए 

इस सुन्दर तार्किक प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई आदरणीय गिरिराज भंडारी जी 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 13, 2014 at 10:13pm

आपने बिलकुल सही कहा आदरणीय गिरिराज जी. तरलता और सरलता से जीवन को जिया जा सकता है. बहुत -२ बधाई आपको

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 13, 2014 at 8:50pm

और हो जाने दो सार्थक

अपने होने के उस एक नगण्य घटना को ||

 

मित्र - सुन्दर भाव निरूपण  हेतु बधाई i

Comment by Meena Pathak on August 13, 2014 at 2:20pm

अति सुन्दर रचना हेतु सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय गिरिराज जी 

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 13, 2014 at 11:57am
वैसे दुनियां गज़ब की सरलता -तरलता है, ये तो बेकार के वे लोग हैं जो किसी लायक नहीं हैं कि कुछ दे सकें दुनिया को और ठेकेदार बने बैठे हैं हर जगह ताकि मौज करते रहें और दूसरों के लिए दुनियाँ और जिंदगी दोनों कठोर करते रहें .
कुछ नया है , अच्छा है , बहुत बहुत बधाई आ o गिरिराज जी .

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