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दोहे --मीना पाठक

हे भगवन वर दीजिए, रहे सुखी संसार |
घर परिवार समाज पे, बरसे कृपा अपार ||


दीन दुखी कोई न हो, ना सूखे की मार |
अम्बर बरसे प्रेम से, भरे अन्न भण्डार ||

कृपा करो हे शारदे, बढ़े कलम की धार |
अक्षर चमके दूर से, शब्द मिले भरमार ||

बेटी सदन की लक्ष्मी, मिले उसे सम्मान |
रोती जिस घर में बहू, होती विपत निधान ||

मीना पाठक 
मौलिक अप्रकाशित 

(दोहों पर एक छोटा सा प्रयास है )

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Comment by शिज्जु "शकूर" on June 25, 2014 at 6:39pm

आदरणीया मीना पाठक जी आपको बहुत बहुत बधाई अच्छी दोहावली रची है आपने।

मेरी समझ के अनुसार मात्रा गणना तो सही लग रही हैं लेकिन क्षमा सहित, क्या सुख को सु्क्ख कहा जा सकता है?

Comment by Maheshwari Kaneri on June 25, 2014 at 5:56pm

  आदरणीया मीना जी बहुत सुंदर दोहे। … हार्दिक बधाई   ..

Comment by annapurna bajpai on June 25, 2014 at 5:25pm

वाह !! आ0 मीना दी , बहुत खूब दोहे लिखे । किन्तु मात्राओं को पुनः जाँचना होगा । 

Comment by Ravi Prabhakar on June 25, 2014 at 4:30pm

ग्रामर के बारे में तो सुध्‍िाजन ही जाने परन्‍तु मेरे लिए तो एक एक दोहा "लक्‍ख लक्‍ख रूपये दा"

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 25, 2014 at 3:41pm

सुंदर तथा आवश्यक. बधाई आ० मीना जी.

Comment by Sushil Sarna on June 25, 2014 at 3:34pm

वर्तमान परिपेक्ष्य में रचित सुंदर दोहे। … हार्दिक बधाई   .... आदरणीया मीना जी क्षमा सहित  कृपया विषम चरणों की मात्राओं पुनः जांच लें। …। प्रथम दोहे के द्वितीय विषम चरण का अंत गुरु से होना चाहिए  ....  जांच लें  . संक्षेप में दोहों पर आपका प्रयास सराहनीय है  … हार्दिक बधाई इस सृजन हेतु।  कृपया अन्यथा न लें।  

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 25, 2014 at 3:05pm
आकर्षक और सामयिक , बधाई.

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