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वैसे तो मैं
हर डगर से पहुँच जाता हूँ
तेरे पास .
मगर यह
प्रेम डगर बहुत कठिन है.
तुम्ही आ जाओ न
ढलान से होकर.

डॉ. विजय प्रकाश शर्मा
(मौलिक व् अप्रकाशित )

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 13, 2014 at 11:21pm

बहुत सुंदर, बधाई आपको आदरणीय विजय जी

Comment by Meena Pathak on June 13, 2014 at 6:04pm

सुन्दर बहुत सुन्दर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 13, 2014 at 5:55pm

शर्मा जी

आपका आभार प्रदर्शन  मुझे भा  गया  i

चलो मै उसी राह पर फिर आ गया  ii
धन्यवाद श्रीमन i

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 13, 2014 at 4:33pm

डॉ. गोपाल जी,
पहले तो मेरे आभार को स्वीकारो तुम
पीछे फिर राहों के फिसलन पे सोंचना.
पहले तो प्यार के फुहार को सम्हालो तुम
पीछे ढलान और फिसलन को जोड़ना.
सादर.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 13, 2014 at 3:47pm

शर्मा जी

अपनी मुसीबत अगले के गले मढ़ दी i यह भी न सोचा ढलान फिसलन भरी हुयी तो   ?

यहतो प्यार न हुआ -

पागल रे वह मिलता है कब ?

उसको तो देते ही है सब

आंसू के कण-कण से गिनकर

यह विश्व लिए है ऋण उधार i

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 13, 2014 at 12:40pm

आभार लक्ष्मण जी.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 13, 2014 at 11:19am

बहुत खूब आ0.

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