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फौलाद भी

चोट से आकार बदल लेते हैं

या टूट जाते हैं

फिर इंसान की क्या बिसात

कब तक सहेगा चोट

आखिर टूटना पड़ेगा

इंसान ही तो है

मगर

टूटकर भी कायम रहेगा

या बिखर जायेगा

ये इंसान की प्रकृति तय करेगी

 

हालात बदलने को तैयार है

पुरानी सड़क पर

डामर की नई परत बिछेंगी

खण्डरों का जीर्णोद्धार होगा

पुरानी इमारत के मलबे पड़े हैं

कुछ मलबे काम आयेंगे

कुछ मलबे मिटाये जायेंगे

ये इंसान भी

एक रोज़ मलबे की तरह पड़ा होगा

 

भंगार अनुपयोगी है

मगर भंगार की भी कीमत है

कुछ भंगार हैं

पानी की खाली बोतल की तरह

जिसकी कोई कीमत नही

खाली तो खत्म

मेरे दिल ने मुझसे पूछा

भंगार तुम्हे भी होना है

ये कहो

टूटकर भी काम आओगे

या टूटकर सड़ोगे?

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 20, 2014 at 6:51pm

आदरणीय जवाहर लाल जी हर इंसान टूट के नहीं सँभलता कोई कोई कुण्ठाग्रस्त हो जाता है कुण्ठा या अवसाद एक तरह की सड़न है जिसका असर आसपास के माहौल पर भी पड़ता है। नियति जैसी हो जिसे सँभलना है सँभल ही जाता है।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 20, 2014 at 6:47pm

आदरणीय भ्रमर जी आपने रचना के मर्म को समझा और सराहा आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 20, 2014 at 6:46pm

आदरणीय महेश्वरी जी आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 20, 2014 at 6:45pm

आदरणीय लक्ष्मण जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 20, 2014 at 6:45pm

आदरणीय जितेन्द्र जी आपका हार्दिक आभार मैं भी कुछ ऐसे ही दौर से गुज़र रहा हूँ अभी तक तो चोट को झेल लिया अब आगे क्या हो देखते हैं।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 20, 2014 at 5:28pm

शिज्जू भाई

बहुत खूब  i  अनिवर्चनीय i

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 20, 2014 at 1:07pm

मगर
टूटकर भी कायम रहेगा
या बिखर जायेगा
ये इंसान की प्रकृति तय करेगी...बिलकुल सही कहा है

पानी की खाली बोतल की तरह
जिसकी कोई कीमत नही
खाली तो खत्म... आदरणीय शिज्जू जी इस बेहतरीन रचना के लिए तहे दिल बधाई स्वीकार करें सादर

Comment by vijay nikore on May 20, 2014 at 11:45am

सोचने को बाधित करती इस सुन्दर रचना के लिए बधाई, आदरणीय।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 19, 2014 at 9:04pm

आदरणीय शिज्जू भाई , बहुत सही चिंतन है , सब कुछ हमारी आंतरिक संरचना , आंतरिक शक्ति पर निर्भर है ॥ रचना के लिये आपको बहुत बधाइयाँ ॥

Comment by Meena Pathak on May 18, 2014 at 9:15pm

बहुत सुन्दर ...बेहतरीन रचना .. बहुत बहुत बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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