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ग़ज़ल-चादनीं तुम मेरी बनीं हो क्या

दूर है चाँद बंदगी हो क्या

दिल की बस्ती में रौशनी हो क्या 

 

और के ख्वाब को न आने दिये

ख्वाब में ऐसी नौकरी हो क्या 

 

मुड़के देखा हमें न जाते हुये

तल्ख़ इससे भी बेरुखी हो क्या 

 

ज़ख्म देकर तो खुश हुये उस दिन

मुझसे मिलकर उदास भी हो क्या 

 

गा तो सकता था मैं भी तेरी ग़ज़ल

यूँ कभीं मेरी धुन सुनीं हो क्या

 

साथ सदियों तलक दे सकता था मैं

दो कदम साथ तुम चली हो क्या

 

सोचकर क्यूँ ये रात ढलती रही

तुम हमें भी यूँ सोचती हो क्या

 

ख़त मेरे सामनें जलाये फ़क़त

और तेरी ये दिल्लगी हो क्या

 

बन तो सकता था मैं भी यूँ तेरारवि

चादनीं तुम मेरी बनीं हो क्या

===============================

मौलिक और अप्रकाशित-अतेन्द्र कुमार सिंह'रवि'

===============================

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Comment

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Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on April 15, 2014 at 11:23pm

आदरनीय सौरभ सर जी सादर प्रणाम .....हमें आपके प्रतिक्रिया की निरंतर प्रतीक्षा रहती है ....आपके सुझाव और मार्गदर्शन से ही यह हमारा प्रयास संभव हो सका है और आगे भी आपके आशीर्वाद की कामना करते हैं .....आपको हमारी गज़ल पसंद आई ...सहृदय धन्यवाद आपको

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on April 15, 2014 at 11:18pm

आदरणीया प्राची दीदी आपको हमारी गज़ल पसंद आई हम आपके आभारी हैं ....सहृदय धन्यवाद आपको

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on April 15, 2014 at 11:16pm

आदरणीय बैद्यनाथ जी आपने हमारी गज़ल के जिस शेर को पसंद किया और सराहना की ...आभार सहित बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on April 15, 2014 at 11:13pm

आदरणीय नीरज जी आपको हमारी गज़ल पसंद आई ....आपको सहृदय धन्यवाद

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on April 15, 2014 at 11:11pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी आपके सुझाव पर हम गौर करेंगे .....आपको गज़ल पसंद आई ...आपको बहुत बहुत धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 15, 2014 at 10:57pm

मुड़के देखा हमें न जाते हुये

तल्ख़ इससे भी बेरुखी हो क्या ... .... वाह !

बहुत खूब !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 4, 2014 at 7:08pm

सुन्दर ग़ज़ल हुई है आ० अतेन्द्र जी 

आदरणीया राजेश कुमारी जीने बहुत ही सम्यक सुझाव दिए हैं , उनपर अवश्य ही गौर फरमाएं 

शुभकामनाएं 

Comment by Saarthi Baidyanath on April 3, 2014 at 4:53pm

बहुत ही दिलकश शेर 

बन तो सकता था मैं भी यूँ तेरा ‘रवि

चादनीं तुम मेरी बनीं हो क्या....वाह ..बहुत बहुत बधाई 

Comment by Neeraj Neer on April 3, 2014 at 8:23am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल ..

साथ सदियों तलक दे सकता था मैं

दो कदम साथ तुम चली हो क्या... क्या कहने ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 2, 2014 at 2:35pm

दूर है चाँद बंदगी हो क्या

दिल की बस्ती में रौशनी हो क्या ------वाह्ह्ह सुन्दर मतला 

 

और के ख्वाब को न आने दिये-----आने दिया---- कर लीजिये ख़्वाब एक वचन है तो दिया आएगा 

ख्वाब में ऐसी नौकरी हो क्या 

 

साथ सदियों तलक दे सकता था मैं----इसकी बह्र एक बार जांच लें ----दे की मात्रा मेरे ख्याल से यहाँ नहीं गिरा सकते और शब्द भी अधिक लग रहे हैं -----साथ सदियों तलक मैं दे सकता ---करके देखिये बात बन जायेगी 

सुन्दर ग़ज़ल हुई अतेन्द्र जी बहुत -बहुत बधाई 

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