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बदला हुआ नजारा क्यूँ खुद आप सोचिये

२२१२ १२२२ २२१ २१२

वो बज्म में यूं तनहा क्यूँ खुद आप सोचिये

वो मैकदे मैं प्यासा क्यूँ खुद आप सोचिये

 

सूरज फलक पे आता है हर रोज वक़्त पर

फिर भी रहा अँधेरा क्यूँ खुद आप सोचिये

 

बचपन जवान होने से पहले ज़वाँ हुए

है बात इक इशारा क्यूँ खुद आप सोचिये

 

भरपूर तेल बाती भी दमदार थी मगर

किस ने दिया बुझाया क्यूँ खुद आप सोचिये

 

कांधा जो देने आया था हर शख्स गैर था

खुद को ही यूं मिटाया  क्यूँ खुद आप सोचिये

 

पी आग उम्र भर यूं ही जलता रहा हूँ मैं

अपना वदन जलाया क्यूँ खुद आप सोचिये

 

चलने की कोशिशों में मैं माना फिसल गया

पर यूं हँसा जमाना क्यूँ खुद आप सोचिये  

 

जो हँस रहे थे हाथों में ले हार हैं खड़े

बदला हुआ नजारा क्यूँ खुद आप सोचिये

 

मौलिक व अप्रकाशित

डॉ आशुतोष मिश्र 

Views: 709

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 31, 2014 at 10:10am

बहुत लाजवाब गजल कही आपने आदरणीय डा. आशुतोष जी

भरपूर तेल बाती भी दमदार थी मगर

किस ने दिया बुझाया क्यूँ खुद आप सोचिये

 

कांधा जो देने आया था हर शख्स गैर था

खुद को ही यूं मिटाया  क्यूँ खुद आप सोचिये

यह शेर खास लगे ,ढेरों बधाई आपको

Comment by भुवन निस्तेज on March 31, 2014 at 8:14am

भरपूर तेल बाती भी दमदार थी मगर

किस ने दिया बुझाया क्यूँ खुद आप सोचिये

 

कांधा जो देने आया था हर शख्स गैर था

खुद को ही यूं मिटाया  क्यूँ खुद आप सोचिये

adbhut bhav! Badhai ho aadarniy...

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