For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल: वो चिड़ियों जैसे पर लाया

बस्ते में रोटी भर लाया

बच्चा भी ये क्या घर लाया 


होठों पे खुशियाँ धर लाया
वो बोले किसकी हर लाया

सोने चांदी सब नें मांगे
वो चिड़ियों जैसे पर लाया

इक तूफानी झोंका आया
जाने किसका छप्पर लाया

दुत्कारा लोगों नें उसको
जो धरती पे अम्बर लाया

काम के इंसा मैंने मांगे
वो बस्ती से शायर लाया

भुवन निस्तेज
(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 647

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 4, 2014 at 2:53pm

आ. भुवन भाई , बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 4, 2014 at 2:40pm

एक बात स्पष्ट करूँ आदरणीय भुवनजी, मैं क्यों कर की बात कर रहा हूँ. न कि क्या कर की. शायद पिछली बार क्या कर को क्यों कर पढ़ गया होऊँ.  हो सकता है. फिरभी, क्या कर लाया बहुत संप्रेषणीय वाक्यांश नहीं है.

या, चूँकि मैं मतले का अर्थ स्पष्ट नहीं समझ पा रहा हूँ, आप कृपया मुझे वहाँ पहुँचायें जहाँ इस मतले का अर्थ है. शायद फिर मु्झे अर्थ सुलभ हो पायेगा.

सादर

Comment by भुवन निस्तेज on April 4, 2014 at 2:01pm

आदरणीय Saurabh Pandey साहब स्नेह हेतु आभार.

मतले का उला ''घर से वो ये क्या कर लाया
बस्ते में रोटी भर लाया'' है. क्या कर के  प्रयोग से अस्पष्टता है या क्यों कर के प्रयोग से या दोनों के कृपया मार्गदर्शन प्रदान करें. मैं मतले पर यथोचित श्रम करूँगा.

मकते पर मैं पुनर्विचार कर रहा हूँ ...

आभार...

Comment by Arun Sri on April 3, 2014 at 12:02pm

//घर से वो ये क्या कर लाया
बस्ते में रोटी भर लाया//

सोने चांदी सब नें मांगे
वो //चिड़ियों जैसे पर// लाया

काम के इंसा मैंने मांगे
वो बस्ती से //शायर// लाया

इक तूफानी झोंका //आया//
जाने किसका छप्पर लाया

अच्छा प्रयास हुआ है गज़ल पर !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 3, 2014 at 11:47am

सोने चांदी सब नें मांगे
वो चिड़ियों जैसे पर लाया

काम के इंसा मैंने मांगे
वो बस्ती से शायर लाया.. .. वाह वाह !

इन दो शेरों के लिए बहुत बहुत बधाई.

वैसे, एक बात कहूँ, क्यों कर का सही अर्थ है कैसे. अब मतले को इस अर्थ के साथ देखें. शायद वह अस्पष्ट लगने लगे.

इसी तरह आखिरी शेर भी मेरे लिए अस्पष्ट रहा. इसके उला सानी में बह्र की नहीं मायने की अस्पष्टता लगी है. 

इक तूफ़ानी वाले शेर में ऐब है.

सादर

Comment by भुवन निस्तेज on March 30, 2014 at 5:18pm

आदरणीय Dr Ashutosh Mishra  साहब, आप को कोटि नमन, कृपया इस्लाह देते रहें … 

Comment by भुवन निस्तेज on March 30, 2014 at 5:17pm

आदरणीय अरुन शर्मा 'अनन्त'  जी मैंने तक्तीअ तो २२२२ २२२२ से कि है शायद कहीं भटक गयी हो, कृपया सलाह दे… 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 28, 2014 at 5:44pm

भुवन जी 

सोने चांदी सब नें मांगे

वो चिड़ियों जैसे पर लाया

  इस शे र के लिए तहे दिल बधाई सादर 

Comment by अरुन 'अनन्त' on March 28, 2014 at 10:58am

कृपया ग़ज़ल की बह्र से अवगत करायें

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
21 hours ago
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"पत्थर पर उगती दूब ============ब्रह्मदत्तजी स्नान-ध्यान-पूजा आदि से निवृत हो कर अभी मुख्य कमरे में…"
Friday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service