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भुवन निस्तेज's Blog (12)

ग़ज़ल:गगन में हैं हमारे पाँव भूतल ढूँढ़ते हैं (भुवन निस्तेज)

है खोया क्या  किसे वो आज हर पल ढूँढ़ते हैं,

गगन में हैं हमारे पाँव भूतल ढूँढ़ते हैं ।

 

सभाओं में कोई चर्चा कोई मुद्दा नहीं है,

सभी नेपथ्य में बैठे हुए हल ढूँढते हैं ।

 

उन्हें होगा तज्रिबा भी कहाँ आगे सफर का,

वो सहरा में नदी, तालाब, दलदल ढूँढ़ते हैं ।

 

कहीं से खुल तो जाये कोठरी ये आओ देखें,

दरों पर खिडकियों पर कोई सांकल ढूँढ़ते हैं ।

 

यूँ भी बेकारियों का मसअला हो जायेगा हल,

जो अब तक खो दिया है…

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Added by भुवन निस्तेज on August 30, 2015 at 8:30am — 14 Comments

ग़ज़ल: कोई पत्थर और कोई आईने ले के(भुवन निस्तेज)

कोई पत्थर और कोई आईने ले के

आ रहा हर एक अपने दायरे ले के



यूँ चले हो रात को दीपक बुझे ले के

खुद अँधेरा भी परेशाँ है इसे ले के



बस ठिठुरते रह गए दरवाजे बाहर ख्वाब

ये सुबह आई है कितने रतजगे ले के



जिंदगानी तंग गलियां भी न दे पाई

मौत हाजिर हो गई है हाइवे ले के



आपका आना तो कल ही सुर्ख़ियों में था

आज फिर अख़बार आया हादसे ले के



साकिया यूँ बेरुखी से मार मत हमको

रिन्द जायेगा कहाँ ये प्यास ले ले के



कुछ न कुछ…

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Added by भुवन निस्तेज on January 15, 2015 at 7:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल: कांटे जो मेरी राह में (भुवन निस्तेज)

कांटे जो मेरी राह में बोये बहार ने

छूकर बना दिया है उन्हें फूल यार ने

 

यारी है तबस्सुम से करी अश्क-बार ने

कुछ तो असर किया है खिजाँ की फुहार ने…

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Added by भुवन निस्तेज on September 14, 2014 at 10:00pm — 18 Comments

ग़ज़ल:वो भूलने का असर यादगार से कम था(भुवन निस्तेज )

कहाँ तूफान था वो तो बयार से कम था

वो भूलने का असर यादगार से कम था



खयाल आते ही मुरझाये फूल खिलते थे

गुमाँ-ए-वस्ल कहाँ इस बहार से कम था



छुपाके अश्क तबस्सुम उधार ले ली थी

कहाँ ये चेहरा मेरा इश्तेहार से कम था



वो याद मुझको किये रात दिन रहा ऐसे

मेरा रक़ीब कहाँ तेरे यार से कम था



खरीददार सा आँखों में रौब था सब के

वो घर कहाँ किसी चौक-ओ-बाज़ार से कम था



  मैं ग़मज़दा था, मै निस्तेज था औ' घायल भी

मैं मुन्तसिर था मगर अब की…

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Added by भुवन निस्तेज on July 31, 2014 at 10:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल: हवा का शौक जब पर कुतरना हो गया है

हवा का शौक जब पर कुतरना हो गया है

तभी से इंकलाबी परिन्दा हो गया है

 

वो मेरी रहगुजर का उजाला हो गया है

उसे है जब भी देखा सवेरा हो गया है

 

तुम्हारे बिन गुजारा हमारा हो गया है

हमें जीनें का पक्का इरादा हो गया है

 

यहाँ बस्ती जली थी औ' ये अख़बार चुप था

तिरा आना ख़बर में धमाका हो गया है

 

शराफ़त,सच व ईमां हो सीरत आदमी की

मियाँ किस वहम में हो तुम्हें क्या हो गया है

 

ये मौसम संगदिल है या सूरज की…

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Added by भुवन निस्तेज on July 5, 2014 at 11:00pm — 17 Comments

ग़ज़ल :अब वफ़ा की कोई कीमत है नहीं

आदमी में आदमीयत है नहीं

इससे बढ़कर  कोई दहशत है नहीं

 

रासते, मंजिल, सफ़र, सब है मगर

इस मुसाफिर में वो सीरत है नहीं

 

बीज जो बोया वही उग पायेगा

इस जमीं की वो हकीकत  है नहीं

 

काम के बन जायेंगे हम भी यहाँ

जब बड़े लोगों की सोहबत है नहीं

 

सन्निकट मृत्यु के जाकर ये लगा

ज़िन्दगी कम खूबसूरत है नहीं

 

अब गिला ‘निस्तेज’ कर के क्या करे

अब वफ़ा की कोई कीमत है नहीं

भुवन…

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Added by भुवन निस्तेज on May 6, 2014 at 9:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल: शह्र के अख़बार को मत हमजुबाँ रखिये

दिल में उम्मीदों का चलता कारवाँ रखिये

हर अँधेरे के लिए कोई शमाँ रखिये

 

बज़्म में आ ही गए कुछ तो निशाँ रखिये

कुछ अलग अपना भी अंदाज़े बयाँ रखिये

 

रोज़ का मेहमाँ कोई मेहमाँ नहीं होता

शह्र के बाहर सही अपना मकाँ रखिये

 

देवता, बुत और पत्थर बन के रहते हो

कुछ तो इंसानों के जैसी ख़ामियाँ रखिये

 

ख्वाब जब होंगे नहीं तासीर क्या होगी  

ख्वाब को अब तो सवार-ए-कहकशाँ रखिये

 

तीरगी को है मिटाती एक…

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Added by भुवन निस्तेज on April 14, 2014 at 10:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल: जां कभी ये जहान लेता है

जां कभी ये जहान लेता है

और कभी आसमान लेता है



सब्र का इम्तेहान लेता है

हिज़्र का पल भी जान लेता है



रिंद आबे हयात पी आया 

और वाइज़ बयान लेता है



लोग कहते हैं सर कटा ले तू

और वो बात मान लेता है



पैरवी कर के वो लुटेरों की

रोज मुफ़लिस की जान लेता है



लो ग़ज़ल बन गयी ये कहते हैं

जब वो कहने की ठान लेता है



वो मुझे राज़दार है कहता 

और शमशीर तान लेता है



धार आ जाती है हवाओ में

ख्वाब जब भी उड़ान…

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Added by भुवन निस्तेज on March 30, 2014 at 12:00am — 10 Comments

ग़ज़ल: वो चिड़ियों जैसे पर लाया

बस्ते में रोटी भर लाया

बच्चा भी ये क्या घर लाया 


होठों पे खुशियाँ धर लाया
वो बोले किसकी हर लाया

सोने चांदी सब नें मांगे
वो चिड़ियों जैसे पर लाया

इक तूफानी झोंका आया
जाने किसका छप्पर लाया

दुत्कारा लोगों नें उसको
जो धरती पे अम्बर लाया

काम के इंसा मैंने मांगे
वो बस्ती से शायर लाया

भुवन निस्तेज
(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by भुवन निस्तेज on March 26, 2014 at 2:30pm — 9 Comments

ग़ज़ल: घर की अस्मत घर के बाहर रह गयी

रह गयी कुछ है यही ग़र रह गयी

घर की अस्मत घर के बाहर रह गयी

 

ज़िन्दगी तक उसकी होकर रह गयी  

अपने हिस्से की ये चादर रह गयी

 

वो मुझे बस याद आया चल दिया

शाम मेरी याद से तर रह गयी

 

तृप्ति ने बोला बकाया काम है

और तृष्णा घर बनाकर रह गयी

नाव जब डूबी तो बोला नाख़ुदा

थी कमी सूई बराबर रह गयी*

बन गई मेरी ग़ज़ल वो आ गया

कुछ खलिश फिर भी यहाँ पर रह गयी

भुवन निस्तेज

(मौलिक व…

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Added by भुवन निस्तेज on March 25, 2014 at 11:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल

अपनों नें जो मुझपर फेंका पत्थर है 

वो गैरों के फूलों से तो बेहतर है

 

दुनिया समझी थी वो कोई शायर है

जिसका दामन मेरे अश्कों से तर है

 

ऐ खुशियों तुम सावन बनकर मत आना

पिछली बारिश ने तोडा मेरा घर है

 

भूखा मंदिर जायेगा क्या पायेगा

रोटी बन पाता क्या संगेमरमर है

 

धरती सौ हिस्सों में बाँटो होगा क्या

पक्षी का तो आना जाना उड़कर है

 

चूल्हा जलने से रोको इस बस्ती में

इस बस्ती में आंधी आने का…

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Added by भुवन निस्तेज on March 19, 2014 at 2:00pm — 18 Comments

ग़ज़ल

ज्यों जवां ये चांदनी होने लगी

त्यों सुबह की सुगबुगी होने लगी

 

जब समंदर सी नदी होने लगी

साहिलों सी ज़िन्दगी होने लगी

 

आदमी में हो न हो रूहानियत

आदमीयत लाज़मी होने लगी

 

तितलियों को मिल गयी जब से भनक

बाग़ में कुछ सनसनी होने लगी

 

यार ने आदी बनाया इस क़दर

हर नए ग़म से ख़ुशी होने लगी

 

आँधियों से रूह कांपी रेत की

पर्वतों में दिल्लगी होने लगी

 

फिर मुसाफ़िर रासता मंजिल…

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Added by भुवन निस्तेज on March 14, 2014 at 9:30pm — 8 Comments

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