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एक मासूम...

तल्लीनता से जोर-जोर पढ़ रहा था

क-कमल,ख-खरगोश,ग-गणेश।

शिक्षक ने टोका

ग-गणेश! किसने बताया?

बाबा ने...

माँ और पिता को सब कुछ माना

तभी तो सबसे बड़े देव हुए।

नहीं,गणेश नहीं कहते

संप्रदायिकता फैलेगी

जिसे तुम समझो झगड़ा. .विवाद

ग-गधा कहो बेटे।

आस्था भोली थी

बाबा के गणेश,मसीहा और अल्लाह से रेंग

'गधे' में शांति खोजने लगी...।

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by vijay nikore on February 4, 2014 at 7:48am

वर्तमान शिक्षा का स्तर क्या है, इसकी दिशा क्या है .... आपकी यह रचना इसे स्पष्ट करने में सफ़ल हुई है, आदरणीया वंदना जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on February 4, 2014 at 12:22am
वंदना जी, आपकी यह रचना सोचने को,सिहरने को,बरबस मुस्कुराने को मजबूर करती है...इसीलिए एक सार्थक रचना है. सादर.
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 3, 2014 at 11:39pm

बहुत बढ़िया व्यंग, हार्दिक बधाई आदरणीया वंदना जी

Comment by बृजेश नीरज on February 3, 2014 at 7:35pm

 छदम धर्मनिरपेक्षता ने देश और समाज के ढाँचे को बहुत नुकसान पहुँचाया है! इस नकली चेहरे पर आपकी कविता जोरदार चोट करती है! इस बेहतरीन अभिव्यक्ति पर आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Meena Pathak on February 3, 2014 at 2:25pm

बहुत बढियाँ ....बधाई 

Comment by ram shiromani pathak on February 3, 2014 at 12:05pm

सुन्दर  व्यंग  है  आदरणीया  वंदना  जी  ..........  हार्दिक बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 2, 2014 at 8:03pm

आदरनीया वन्दना जी , सुन्दर रचना है ,  वोट की राजनीति से उपजी मज़बूरी है , अब गधे मे ही शांति खोजनी पड़ेगी ॥ आपको बहुत बधाई , रचना के लिये ॥

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