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गजल [सरिता भाटिया]

दिलों को जो सुहाते हैं /
दिलों पे जाँ लुटाते हैं /

निगाहों से क़त्ल करके
मुझे कातिल बनाते हैं /

दिलों के हैं अजब रिश्ते
सदा अपने निभाते हैं /

यूँ पल पल मर रही हूँ मैं
मुझे जिन्दा बताते हैं /

सभी अपने तुम्हारे बिन
मुझे जीना सिखाते हैं /

सुना है ऐसे में अपने
भी दामन छोड़ जाते हैं /

.....................................

..मौलिक व् अप्रकाशित....

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 30, 2014 at 11:47am

हृदयस्पर्शी भावों को सुन्दर ग़ज़ल का रूप मिला है. बधाई,  आदरणीया सरिता जी..

क़त्ल लिखा है तो कतल न पढ़ें न बह्र में बाँधे... उसे कतल ही लिखें/ उर्दू लिहाज़ में फिर अक्षरी बनाये रखने का आग्रह उचित नहीं.

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 23, 2014 at 9:51pm

यूँ पल पल मर रही हूँ मैं 
मुझे जिन्दा बताते हैं /...................बहुत खूब 

सुन्दर ग़ज़ल हुई है आ० सरिता भाटिया जी 

शुभकामनाएं 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 23, 2014 at 8:49pm

आदरणीया सरिता जी, बहुत मर्मस्पर्शी गजल पर बधाई स्वीकारे

Comment by बृजेश नीरज on January 23, 2014 at 8:29pm

सुन्दर ग़ज़ल! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by विजय मिश्र on January 23, 2014 at 5:43pm
वाह सरिता दीदी ,मन की बात रखी | साधुवाद |
Comment by Sarita Bhatia on January 22, 2014 at 9:01pm

आदरणीय शिज्जू जी हार्दिक आभार 

Comment by Sarita Bhatia on January 22, 2014 at 9:01pm

प्रिय अरुण शुक्रिया ,स्नेह बनाये रखें |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 22, 2014 at 8:09pm

आदरणीया सरिता जी अच्छी ह्रदयस्पर्शी ग़ज़ल है बधाई स्वीकार करें

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 22, 2014 at 11:57am

आदरणीय सरिता जी व्याकुल मन से निकली बेहद सुन्दर ग़ज़ल. सभी अशआर पसंद आये ढेरों दिली दाद कुबूल फरमाएं.

Comment by Sarita Bhatia on January 22, 2014 at 10:21am

वंदना जी हार्दिक आभार 

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