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बहर ... २२२ २२२ २२ 

वो जब से सरकार हुए हैं

सब कितने लाचार हुए हैं

जन सेवा अब नाम ठगी का

सपनोँ के व्यापार हुए हैं

धोखे देते बन के साधू

ऐसे ठेकेदार हुए हैं

मज़हब के भी नाम पे देखो

कितने अत्याचार हुए हैं

जो थे अब तक झुक कर चलते

वो अबकी खुददार हुए हैं

 

मौलिक  एवं अप्रकाशित 

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Comment by Madan Mohan saxena on December 3, 2014 at 3:17pm

जन सेवा अब नाम ठगी का
सपनोँ के व्यापार हुए हैं

धोखे देते बन के साधू
ऐसे ठेकेदार हुए हैं
बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी बेह्तरीन अभिव्यक्ति !शुभकामनायें.

Comment by नादिर ख़ान on December 31, 2013 at 11:24pm

जन सेवा अब नाम ठगी का

सपनोँ के व्यापार हुए हैं

मज़हब के भी नाम पे देखो

कितने अत्याचार हुए हैं

आदरणीया महिमा जी, बहुत खूब कहा आपने और अपने ही अंदाज़ मे ....लाजवाब ।

आपको नये साल की अग्रिम शुभकामनायें ।

Comment by MAHIMA SHREE on December 29, 2013 at 8:07pm

जरुर :))))))आदरणीय बृजेश जी वैसे भी सर्दियों में गुड़ खाना सेहत के लिए बहुत अच्छा होता है  ...:)))

आपका हार्दिक आभार. सादर

Comment by बृजेश नीरज on December 27, 2013 at 8:25pm

//बस काली मिर्ची से ही काम चलाना पड़ा//

मैं भविष्य के लिए सचेत हो गया! आगे से गुड़ लेकर बैठूँगा! :))))))))))))))):

लाजवाब ग़ज़ल हुई है! आपको ढेरों बधाई!

Comment by MAHIMA SHREE on December 27, 2013 at 7:19pm

आदरणीय सौरभ सर , नमस्कार .. ओबिओ का सीखने सिखाने का वातावरण.. और उस पर  आप गुरुजनों का हर विधा पर जोर  ... विद्यार्थी कितना भी जिद्दी हो तब भी उसके दिमाग में बैठा ही दिया जाता है ..दूसरी विधाओं पर भी हाथ आजमाओ भाई .. :))))

आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा थी ... सच कहूँ तो अतुकांत में आदत है जी भर के कडवाहट निकलने  की (करेले के जूस में लाल मिर्ची   :))))).. पर गज़ल  में तो कसमसा कर रह  गयी   बस काली मिर्ची से ही काम चलाना पड़ा :))))) 

 

बरहाल हर नवोदित को ओबिओ पर आपके विस्तृत सूक्ष् विश्लेषण की प्रतीक्षा रहती है ...आपकी प्रतिक्रिया ने आसमान पर पहुँचा दिया ... आदरणीय .. मन प्रसन्न है ..प्रयास सार्थक हुआ .. आशीर्वाद देते रहें .. सादर

 

Comment by MAHIMA SHREE on December 27, 2013 at 7:03pm

आदरणीय ब्रह्मचारी सर .. आपका आशीर्वाद मिला आभारी हूँ  .. स्नेह बनाये रखे सादर ..

Comment by MAHIMA SHREE on December 27, 2013 at 7:02pm

प्रिय रामशिरोमणि जी .. गज़ल की सराहना के लिए आपका  बहुत -२ आभार ...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 27, 2013 at 4:02pm

आपसे ग़ज़ल सुनकर ही चौंक गया. तिसपर ग़ज़ल की ये रवानी, उसके ये तेवर ! महिमा श्री, आपके कई शेर बस कालीमिर्च की बुकनी जैसे हुए हैं, जिसकी तनिक रुक कर मगर देर तक तासीर बनी रहती हैं. यह ग़ज़ल तो बस क़ामयाब हो गयी !
बधाई.. बधाई.. बहुत खूब !

Comment by S. C. Brahmachari on December 26, 2013 at 11:06pm
मजहब के भी नाम पे देखो
कितने अत्याचार हुए हैं ............ उत्तम अभिव्यक्ति , उत्कृष्ट गजल ! नव वर्ष मे आपके महिमा की श्री वृद्धि होती रहे !
Comment by ram shiromani pathak on December 26, 2013 at 10:10pm

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल आदरणीया महिमा जी। …  हार्दिक बधाई आपको 

कृपया ध्यान दे...

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