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राह मे दुश्वारियां थीं जब चले थे घर से हम ( गज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122  2122   2122  212

सिलसिले उनके छिपे, कांटो से भी मिलते गये 

फिर भी ऐसा क्यों हुआ वो फूल सा खिलते गये

 

राह मे दुश्वारियां थीं जब चले थे घर से हम

बिन रुके चलते रहे तो रास्ते मिलते गये 

 

हम भी फौलादी पकड़ रखते थे अपनी बात पर   

प्यार से हमको हिलाया और हम हिलते गये    

 

या तो जादू था किसी का या किसी का ख़ौफ़ था

बोलने वाले सभी के होंठ क्यों सिलते गये  

 

चीज़ क्या है प्यार परवाने बतायेंगे सही

जो शमाँ के पास आये, आग में मिलते गये

लौट के आये  तो पाये कुछ नये ही शख़्स उनमें       

वो सभी जो ख़ुद के भीतर ख़ुद से ही मिलते गये 

***************************************            

मौलिक एवँ अप्रकाशित    ( संशोधित )        

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 14, 2013 at 7:49am

आदरणीय बड़े भाई विजय जी , गज़ल को आपका आशीर्वाद मिला , बहुत खुशी हुई , आपका हार्दिक आभार !!!!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 14, 2013 at 7:48am

आदरणीया महिमा श्री जी , गज़ल की सराहना  कर उत्साह वर्धन करने के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया !!!!!!

Comment by vijay nikore on December 14, 2013 at 12:28am

बहुत उम्दा गज़ल है। बधाई, आदरणीय भाई।

Comment by MAHIMA SHREE on December 13, 2013 at 10:04pm

हम भी फौलादी पकड़ रखते थे अपनी बात पर   

प्यार से हमको हिलाया और हम हिलते गये    

लौट के आये  तो उनमें  भी नया ही शख़्स था    

वो सभी जो ख़ुद के भीतर ख़ुद से ही मिलते गये ....वाह वाह .. बेहद   उम्दा .. बहुत -२ बधाई आ. गिरिराज जी

 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 13, 2013 at 9:50pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया !!!!!!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 13, 2013 at 9:33pm

आदरणीय गिरिराज जी, बहुत लाजवाब गजल , यह शेर बहुत खास हुए दिली दाद कुबूल कीजिये

राह मे दुश्वारियां थीं जब चले थे घर से हम

बिन रुके चलते रहे तो रास्ते मिलते गये 

 

हम भी फौलादी पकड़ रखते थे अपनी बात पर   

प्यार से हमको हिलाया और हम हिलते गये    

 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 13, 2013 at 8:39pm

आदरणीय सन्दीप भाई , गज़ल की सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया !!!!!!!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 13, 2013 at 8:22pm

या तो जादू था किसी का या किसी का ख़ौफ़ था

बोलने वाले सभी के होंठ क्यों सिलते गये 
//////////waah waah sir ji .............बेहतरीन ग़ज़ल कही है आपने .....ढेरों दाद क़ुबूल करें जय हो


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 13, 2013 at 8:10pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , !!! आपको गज़ल पसन्द आयी तो मेरा गज़ल कहना सफल हुआ !!!! सरहाना के लिये आपका आभार !!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 13, 2013 at 8:09pm

आदरणीय नीलेश भाई , गज़ल की  सराहना के लिये आपका शुक्रिया !!!! आपने सही कहा है , मिलते,का कई बार उपयोग मेरी कमी ही बता रही है , मज़ा भी कम हो रहा है , मै स्वीकार करता हूँ !!! दर असल ये मेरी बहुत पुरानी गज़ल है , जब मै बह्र नही जानता था , काफिये मे इता दोष भी था , सुधारते सुधारते थक गया , तो बह्र ठीक करके पोस्ट कर दिया !!! आपका पुनः आभार !!!!

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