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सबने तो वाह वाह की

कैसे सुनाएँ दास्ताँ तरसी निगाह की ।

दौरे ग़मों में किस तरह हमने पनाह की ।

 

दर्दे सितम प्यार में मिलते रहे हमे ,

चुपचाप सह गए कभी हमने न आह की ।

 

बीती फकत जो ज़िन्दगी हमने किया नही ,

हमें सजा भी मिल गयी ऐसे गुनाह की ।

 

एक एक करके हसरतें दम तोड़ती गयीं ,

हमको मिला वही कभी जिसकी न चाह की ।

 

तूफाँ कभी न आया शायद मेरी डगर ,

उसकी डगर में ज़िन्दगी हमने तबाह की ।

 

हाले बयान  ये जो महफ़िल में कर दिया ,

ताली बजा के सबने तो वाह वाह की ।

 

मौलिक व अप्रकाशित

नीरज 'प्रेम'

Views: 784

Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 7, 2013 at 9:36am

गलती के लिए क्षमा चाहती हूँ वीनस जी.  

Comment by वीनस केसरी on December 7, 2013 at 1:18am

आदरणीया राजेश कुमारी जी से मुआफ़ी के साथ अर्ज़ करना चाहता हूँ कि यह ग़ज़ल २२१२    २२१२    २२१२  १२ अर्कान के निकट नहीं है 


यह ग़ज़ल बह्र ए मुजारे के एक उप बह्र के करीब है जिसका अर्काय यह है - २२१ / २१२१ / १२२१ / २१२
इस अर्कान पर ओबीओ में कई तरही मुशायरे हो चुके हैं और इसी अर्कान पर तक्तीअ करते हुए कई मिसरे पूरी तरह बह्र में हैं, थोड़ी सी मशक्कत से ग़ज़ल पूरी तरह बह्र में हो जायेगी, ये सारे मिसरे पूरी तरह बह्र में हैं - 

कैसे सुनाएँ दास्ताँ तरसी निगाह की ।


चुपचाप सह गए कभी हमने न आह की ।

 

बीती फकत जो ज़िन्दगी हमने किया नही ,

हमको सजा भी मिल गयी ऐसे गुनाह की ।

 

एक एक करके हसरतें दम तोड़ती गयीं ,

हमको मिला वही कभी जिसकी न चाह की ।

 

उसकी डगर में ज़िन्दगी हमने तबाह की ।

 


बाकी के मिसरे भी इसी अर्कान के आस पास हैं और बहुत आसानी से दुरुस्त हो जायेंगे
सादर

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 6, 2013 at 10:39pm

आप के भाव को सलाम ... राजेश कुमारी जी ने नब्ज़ पर हाथ रखा है ... गौर कीजियेगा 
सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on December 6, 2013 at 9:29pm

बढ़िया ग़ज़ल के लिए बधाई..................


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 6, 2013 at 7:15pm

नीरज जी आपके मतले के अनुसार आपकी बह्र ---२२१२    २२१२    २२१२  १२ है उसी के अनुसार सभी शेर साध कर देखें ,भाव कहन  बहुत सुन्दर है ठीक करंगे तो ये ग़ज़ल निखर उठेगी ,,,फिलहाल दाद कबूलें 

Comment by coontee mukerji on December 6, 2013 at 6:22pm

एक एक करके हसरतें दम तोड़ती गयीं ,

हमको मिला वही कभी जिसकी न चाह की..........बहुत खूब


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 6, 2013 at 3:16pm

आदरणीय नीरज प्रेम भाई , पूरी रचना मे बहुत खूबसूरती से बातें कही है आपने , आपको हार्दिक बधाइयाँ !!!! बह्र के विषय मे ज़रा सोच के देख लीजिये , जो आपने लिखा है ऊपर क्या सही है ? सभी मिसरों की तकतीअ कर के भी देख लें !!!!! सादर !!!!!

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