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२ १  २  २  २ १  २  २  २ १ २ २

साथ उन से अब  कहाँ  से  बात होगी ׀

दिन को दुनिया,और खुद से रात होगी ׀

 

डूबता   ये   आफताब  हमें ,  बताये    , 

साथ  होए    रौशनी,   प्रभात  होगी ׀

 

देखना  जो   बीजते   हैं,   धरत  कांटे  ,

जख्म फिर इस से मिली सौगात होगी ׀

 

बात ये बीती  नहीं मुझ को है भाती,

ऐ! जमाने कब  नई, फिर बात  होगी ׀

 

क्या  क्या   हम को जमाना दे गया है, 

क्या पता था प्यार भी   खैरात  होगी ׀

׀"मौलिक व अप्रकाशित"

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 23, 2013 at 7:44am

आदरणीय बेगोवाल सर इस प्रयास पर बधाई आपको

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 22, 2013 at 6:43am

सराहनीय प्रयास हेतु बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 21, 2013 at 5:12pm

आदरणीय ये बहुत बेहतर प्रयास हुआ है , दिल से बधाई !!! बातें और सफाई से कहने का प्रयास करें !!!!

Comment by Saarthi Baidyanath on November 21, 2013 at 11:24am

जी साहब ....मानी भी स्वतः स्फूर्त होना चाहिए ..पढ़ने के साथ ही ! ...आपके प्रयास की सराहना करता हूँ ...सादर 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 20, 2013 at 9:13pm

आदरणीय मोहन बेगोआल जी, ग़ज़ल पर अच्छा प्रयास हुआ है किन्तु कहन बेहद उलझा उलझा सा है । बधाई इस प्रयास हेतु । 

कृपया ध्यान दे...

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