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टूटी चूड़ियाँ

बह गया सिन्दूर

साथ ही टूटा

अनवरत

यंत्रणा का सिलसिला

बह गया फूटकर

रिश्तों का एक घाव

पिलपिला

अब चाँद के संग नहीं आएगा

लाल आँखें लिए

भय का महिषासुर

कभी कभी अच्छा होता है

असर

जहरीली शराब  का ..

... नीरज कुमार ‘नीर’

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 1162

Comment

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Comment by Neeraj Neer on November 16, 2013 at 8:00pm

आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी साहब ..

Comment by विजय मिश्र on November 16, 2013 at 4:54pm
दुःख से दुःख जाता है कि एक तर्क और व्यंग युक्त सार्थक प्रस्तुति .बधाई नीरजजी
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 16, 2013 at 3:17pm

आदरणीय नीरज जी ..बहुत व्यंग्यात्मक तरीके से सम्बेदना से जुड़े किसी पहलू को उजागर किया है आपने ..आपको हार्दिक बधाई 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 16, 2013 at 9:39am

अब चाँद के संग नहीं आएगा

लाल आँखें लिए

भय का महिषासुर

कभी कभी अच्छा होता है

असर

जहरीली शराब  का ..

प्रतिदिन के इस भय से छुटकारा, हृदयस्पर्शी पंक्तियों पर बधाई स्वीकारें आदरणीय नीरज जी

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on November 15, 2013 at 10:03pm

एक बेहतरीन कटाक्ष ! बधाई स्वीकारें 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 15, 2013 at 9:50pm

आदरणीय नीरज भाई , लाजवाब रचना की है , सुन्दर रचना के लिये आपको बधाई !!!!

Comment by Neeraj Neer on November 15, 2013 at 7:53pm

आदरणीय मीना जी हार्दिक आभार ..

Comment by Neeraj Neer on November 15, 2013 at 7:53pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव आपके प्रोत्साहन के लिए हार्दिक  आभार ..

Comment by Neeraj Neer on November 15, 2013 at 7:52pm

आभार आदरणीय शिज्जू जी 

Comment by Meena Pathak on November 15, 2013 at 5:37pm

सुन्दर रचना हेतु बधाई स्वीकारें आदरणीय 

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