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देश काल निमित्त की सीमाओं में जकड़े तुम 

और तुम्हारे भीतर एक चिरमुक्त 'तुम'

-जिसे पहचानते हो तुम !

उस 'तुम' नें जीना चाहा है सदा 

एक अभिन्न को-

खामोश मन मंथन की गहराइयों में 

चिंतन की सर्वोच्च ऊचाइंयों में 

पराचेतन की दिव्यता में.....

पूर्णत्वाकांक्षी तुम के आवरण में आबद्ध 'तुम'

क्या पहचान भी पाओगे 

अभिन्न उन्मुक्त अव्यक्त को-

एक सदेह व्यक्त प्रारूप में......?

(मौलिक और अप्रकाशित) 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 13, 2013 at 7:24pm

आदरणीया राजेश जी 

मानव मन कब आपाधापी में नहीं घिरा रहता..? 

रचना पर आने और उसे वक़्त दे सराहने के लिए आपका हृदय से धन्यवाद 

सादर.

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 13, 2013 at 3:43pm

आदरणीया प्राची दी जिस गहनता आप रचनाएँ लिखती हैं उसका पार पाना मेरे लिए सैदव कठिन होता है, प्रस्तुत रचना विचार करने को बाध्य कर रही है बहुत ही गहरे भाव बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by Pradeep Kumar Shukla on November 13, 2013 at 11:04am

vicharniy rachna ... badhai Prachi ji


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 13, 2013 at 9:57am

अभिव्यक्ति में भाव शब्द अंतर्गुन्थन को मान देने के लिए आभार आ० नीरज मिश्रा जी 

Comment by vandana on November 13, 2013 at 6:52am

पूर्णत्वाकांक्षी तुम के आवरण में आबद्ध 'तुम'

क्या पहचान भी पाओगे 

अभिन्न उन्मुक्त अव्यक्त को-

एक सदेह व्यक्त प्रारूप में......?

सत्य से अवगत कराती सार्थक रचना आदरणीया डॉ.साहिबा बहुत सुन्दर चिंतन 

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 13, 2013 at 12:00am

विचारणीय प्रश्न उठाती रचना महत्वपूर्ण दार्शनिक आयामों को समेटे है। 'तुम' को सदेह जानने की कोशिश में कुछ सल्लेखना को प्राप्त कर जाते हैं और कुछ महापरिनिर्वाण को। कुछ पंचभूत में लिप्त होने को ही 'तुम' की प्राप्ति का मार्ग समझते हैं। माननीया आप की अन्य रचना प्रतीक्षित है जो इस गहन प्रश्न का इसी सातत्य में आपके अपने अनुभवों को समेटती सहेजती हो। अंतर्मन को बेधती इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर नमन।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 12, 2013 at 5:37pm

आदरणीया डॉ प्राची जी आपकी इस कविता ने कुछ पलों के लिये स्तब्ध कर दिया था,मैं कुछ पल के लिये अनुत्तरित हो गया, क्या वाकई ये वही "तुम" हैं जो नज़र आ रहा है या अभी तक वो अंदर ही है? इस सवाल का जवाब बहुत मुश्किल है और अधिकतर लोगो के मन में ये अंतर्द्वंद्व चलता ही रहता है,

बहुत ही खूबसूरत और सच्चाई से जुड़ी रचना के लिये दिली दाद कुबूल करें

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 12, 2013 at 5:04pm

आदरणीया प्राची जी ..इस गहन चितन से ओतप्रोत शसक्त रचना के लिए तहे दिल बधाई स्वीकार करें ..सादर 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 12, 2013 at 2:25pm

बहुत ही सुन्दर चिंतन है आपका आदरणीया डॉ प्राची जी

इस सुन्दर रचना हेतु बधाई स्वीकारिये

Comment by Satyanarayan Singh on November 12, 2013 at 10:51am

आ डॉ. प्राची जी सादर,

           दिव्य चिंतन पर आधारित आपकी यह रचना दिव्यता के साथ साथ प्रगल्भ ज्ञान की अनुभूति कराती है. आदरणीया.

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