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!!! सत्य खुलकर पारदर्शी हो गई !!!

!!! सत्य खुलकर पारदर्शी हो गई !!!
बह्र - 2122 2122 212

आज कल की धूप हल्की हो गई।
रंग बातें अब चुनावी हो गई।।

आईना तो खुद बड़ा जालिम यहां
सत्य खुल कर पारदर्शी हो गई।

प्यार का अहसास सुन्दर सांवरा,
दर्द बाबुल की कहानी हो गई।

जब कभी उम्मीद मुशिकल से जगे,
आस्था भी दूरदर्शी हो गई।

आईना को तोड़कर बोले खुदा,
श्वेत दाढ़ी आज पानी हो गई।

शोर है कलियुग यहां दानव हुआ,
साधु सन्तों सी निशानी हो गई।

आज केवल धन गुमां अहसास है,
जोर की लाठी चलानी हो गई।

बोल 'सत्यम' सांस भी जब तक चले,
रहनुमा भी बेईमानी हो गई।

के0पी0सत्यम / मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 10, 2013 at 9:36pm

भाई ..ज़रा ठहरिये और खुद भी एक दृष्टी डाल लें इस रचना पर 
सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 10, 2013 at 9:12pm

आदरणीय केवल भाई , !!!!!!!!!!  खूब सूरत गज़ल के लिये आपको बधाई !!!!!!!!!!!! आदरणीय गोपाल भाई की बात सही लगती है , कृपा कर सुधार कर लें !!!!!!

Comment by annapurna bajpai on November 10, 2013 at 8:51pm

आ0 केवल भाई जी सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें । 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 10, 2013 at 7:20pm

कुछ सामयिक शेर बड़े  अच्छे लगे । बधाई केवल भाई। त्रुटियाँ देख लीजिए ... सादर।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 10, 2013 at 6:43pm

केवलजी ' मुझे लगता है ' सत्य खुलकर पारदर्शी हो गया ' अधिक समीचीन होता  और रहनुमाई   बेईमानी  हो गयी  भी अच्छा लगता  I आप कवि है  इस नाते मेरे अनुज है  I  आशा है आप  मेरी बात को सकारात्मक रूप में लेंगे  I  करत करत अभ्यास के--------=- 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 10, 2013 at 5:22pm

//आईना तो खुद बड़ा जालिम यहां
सत्य खुल कर पारदर्शी हो गई// वाह आदरणीय केवल प्रसाद जी बेहतरीन शेर दाद कुबूल करें, 

और शेर क्र. 4 में टंकण त्रुटि है दूर कर लें

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