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ग़ज़ल - लोग हैं तैयार खुद की लाश ढोने के लिए

ख्वाब के मोती हकीकत में पिरोने के लिए।
लोग हैं तैयार खुद की लाश ढोने के लिए।

झोंपड़े में सो रहा मजदूर कितने चैन से,
है नहीं कुछ पास उसके क्योंकि खोने के लिए।

आसमां की वो खुली, लंबी उड़ानें छोड़कर,
क्यों तरसते हैं परिंदे कैद होने के लिए।

जिंदगी भर खून औरों का बहाते जो रहे,
जा रहे हैं तान सीना पाप धोने के लिए।

जगमगाते हैं दिखावे से शहर के सब मकान,
सादगी तो रह गई है मात्र कोने के लिए।

पुष्प सारे चल दिए रंगीन गमलों की तरफ,
रह गया उजड़ा चमन बदहाल रोने के लिए।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 4, 2013 at 2:37pm

क्या बात कही है हर शेर में , हार्दिक बधाई। 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 4, 2013 at 9:32am

बहुत ख़ूब ... बधाई आदरणीय 

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on November 3, 2013 at 3:51pm

झोंपड़े में सो रहा मजदूर कितने चैन से,
है नहीं कुछ पास उसके क्योंकि खोने के लिए।

वाह बहुत खूब !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on November 3, 2013 at 2:04pm

दीप बाती तेल लेकर आइये,आ जाइए 

खेत में अब रौशनी के बीज बोने के लिए .............

शुभ दीपावली


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 3, 2013 at 8:32am

आदरणीय कुमार भाई , बहुत खूबसूरत , लाज़वाब गज़ल के लिये आपको बधाई !!!!

झोंपड़े में सो रहा मजदूर कितने चैन से,
है नहीं कुछ पास उसके क्योंकि खोने के लिए। ------- इस शेर के लिये ढेरों दाद !!!

Comment by Abhinav Arun on November 3, 2013 at 4:36am

जगमगाते हैं दिखावे से शहर के सब मकान,
सादगी तो रह गई है मात्र कोने के लिए।


पुष्प सारे चल दिए रंगीन गमलों की तरफ,
रह गया उजड़ा चमन बदहाल रोने के लिए।.....वाह श्री गौरव जी क्या कहने ..हर शेर उम्दा है शानदार ग़ज़ल , बधाई !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 2, 2013 at 11:52pm

///जगमगाते हैं दिखावे से शहर के सब मकान,
सादगी तो रह गई है मात्र कोने के लिए।

पुष्प सारे चल दिए रंगीन गमलों की तरफ,
रह गया उजड़ा चमन बदहाल रोने के लिए।///  बेहतरीन अशआर वाह 

ग़ज़ल पे मेहनत तो हुई है दिली दाद कुबूल करें

Comment by वीनस केसरी on November 2, 2013 at 11:48pm

बहुत खूब भाई इस ग़ज़ल की सहजता ने मन को मोह लिया

ढेरो दाद

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