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रांची का रेलवे स्टेशन.

फुलमनी ने देखा है

पहली बार कुछ इतना बड़ा .

मिटटी के घरों और

मिटटी के गिरिजे वाले गाँव में

इतना बड़ा है केवल जंगल.

जंगल जिसकी गोद में पली है फुलमनी

कुलांचे मारते मुक्त, निर्भीक. 

पेड़ों के जंगल से

फुलमनी आ गयी

आदमियों के जंगल में ,

जंगल जो लील जाता है 

जहाँ सभ्य समाज का आदमी

घूरता हैं

हिंस्र नज़रों से

सस्ते पोलिस्टर के वस्त्रों को

बेध देने की नियत से ....

फुलमनी बेच दी गयी है

दलाल के हाथों,

जिसने दिया है झांसा

काम का ,

साथ ही देखा है

उसके गुदाज बदन को

फुलमनी दिल्ली में मालिक के यहाँ

करेगी काम,

मालिक तुष्ट करेगा अपने काम

काम से भरेगा

उसका पेट

वह वापस आएगी जंगलों में

जन्म देगी

बिना बाप के नाम वाले बच्चे को.

(फिर कोई दूसरी फूलमनी देखेगी 

पहली बार रांची का रेलवे स्टेशन..) 

... नीरज कुमार ‘नीर’

पूर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 28, 2013 at 12:15pm

ऐसी रचनाए पढ़कर मन बेहद भावुक हो जाता है, उफ़ के सिवा शब्द मुहं से नहीं निकलता | भाई श्री शुशील जोशी जी

ने वह सब कह दिया है जो मै कहना चाहता था | ऐसी मार्मिक रचना के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on October 27, 2013 at 1:48pm

फुलमनी के बहाने आज की तमाम कड़वी सच्चाइयों पर प्रहार करती रचना.......!!!!

Comment by Sushil.Joshi on October 27, 2013 at 5:57am

इस मार्मिक किंतु सच्चाई को बयान करती अभिव्यक्ति के लिए बधाई आ0 नीरज भाई जी...... जाने कितनी फूलमनी इस प्रकार 'आदमियों के जंगल' में फँस कर रास्ता भटक जाती हैं...... और फिर कथित 'जंगली जानवर' उसकी दावत उड़ाते हैं..... मन भर आया है इस प्रस्तुति को पढ़ कर........ आख़िर कब तक हम इस प्रकार की गतिविधियों को विकासशील देश की प्रगति तले नज़रंदाज़ करते रहेंगे.... आख़िर कब तक....??


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 26, 2013 at 6:57pm

आदरणीय नीरज भाई , आपकी कविता ने समाज की एक बहुत बड़ी समस्या और उसके निवारण के प्रयासों पर सवाल खड़ा किया है !!!!!

यही हाल छतीस गढ का भी है !!!!! आपको इस रचना के लिये ढेरों दाद !!! बहुत बधाई !!!!

Comment by Neeraj Neer on October 26, 2013 at 6:15pm

आदरणीय विजय निकोरे जी हार्दिक आभार ..

Comment by Neeraj Neer on October 26, 2013 at 6:15pm

आपका आभार आदरणीय विजय मिश्र जी .. 

Comment by Neeraj Neer on October 26, 2013 at 6:14pm

बहुत आभार आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी 

Comment by vijay nikore on October 26, 2013 at 6:07pm

नीरज जी, इस सुन्दर रचना से हृद्य-विदारक सच्चाई को सामने लाने के लिए धन्यवाद।

 

 भगवान करें, हज़ारों-लाखों लोग, हज़ारों "अन्ना" इस उत्पात के विरोध में सामने आएँ।

Comment by विजय मिश्र on October 26, 2013 at 5:01pm
नीरजी ! यह झारखण्ड की दुःख भरी कहानी है , इस कार्य में दलालों का एक साम्राज्य सा फैला है जो इन सीधे-सादे वनवासियों को ,छल-प्रपंच जिनकी कल्पना में भी नहीं है ,विश्वास में लेकर उत्पात कर रहे हैं .इनके विश्वास को तहस-नहस कर रहे हैं . आपकी कविता ने जीवन्त ढंग से इस ज्वलन्त प्रश्न को उभरा है .यह आपकी एक प्रतिनिधि कविता है .धन्यवाद .
Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 26, 2013 at 3:28pm

 लचर कानून लचर पुलिस व्यवस्था। लाखों फुल्मनी की व्यथा कह दी आपने नीरज भाई, बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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