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इक शख़्स इस हयात का नक़्शा बदल गया

इक शख़्स इस हयात का नक़्शा बदल गया।

दिल के चमन का रंगो बू सारा बदल गया॥

सोचा था अब न प्यार करेगा किसी से दिल,

उससे मिला तो सारा इरादा बदल गया॥

महफिल में हो रही थी उसी की ही गुफ़्तगू,

देखा उसे तो सबका ही चेहरा बदल गया॥

जबसे उसे सहारा किसी और का मिला,

उस दिन से बातचीत का लहज़ा बदल गया॥

अब रात दिन ख़यालों में ख़्वाबों में है वही,

अंदाज़ मेरे जीने का सारा बदल गया॥

आए गए हज़ार मगर कुछ नहीं हुआ,

इक वो चला गया तो ज़माना बदल गया॥

जिसको समझ रहे थे कि बदलेगा न कभी,

पहचानता नहीं है अब ऐसा बदल गया॥

हमराज़ हमसफ़र भी थे मंज़िल भी एक थी,

आया इक ऐसा मोड़ कि रस्ता बदल गया॥

“सूरज” किसी से प्यार अगर मांगना पड़े,

समझो वहीं पे प्यार का रिश्ता बदल गया॥

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

( मौलिक और अप्रकाशित )

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Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on November 3, 2013 at 12:16am

वीनस भाई वो लहजा है ...काश यहाँ पर एडिट करने की व्यवस्था होती 

Comment by वीनस केसरी on November 3, 2013 at 12:11am

भाई जी बहुत प्यारी ग़ज़ल कही है मगर आपको कई मिसरों पर फिर से काम करना पड़ेगा

एक बात - लहजा / लहज़ा  में बहुत बड़ा अंतर है इसे स्पष्ट कर लीजिए

Comment by रमेश कुमार चौहान on October 27, 2013 at 6:34pm

“सूरज” किसी से प्यार अगर मांगना पड़े,
समझो वहीं पे प्यार का रिश्ता बदल गया॥"-------------------------वाह बहुत खुब आदरणीय सूरजजी बधाई

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 27, 2013 at 11:32am

लाजवाब ग़ज़ल के लिए बधाई मान्यवर 

Comment by vijay nikore on October 26, 2013 at 6:27pm

इस खूबसूरत गज़ल के लिए बधाई।

Comment by शरद कुमार on October 26, 2013 at 12:43pm
लाजवाब ग़ज़ल काही है बाली जी........एक एक शेर खूबसूरत ...... यह कहना मुश्किल है की कौन सा ज्यादा अच्छा है......... फिर भी ये दो बहुत ही पसंद आए :

"आए गए हज़ार मगर कुछ नहीं हुआ,
इक वो चला गया तो ज़माना बदल गया॥"

“सूरज” किसी से प्यार अगर मांगना पड़े,
समझो वहीं पे प्यार का रिश्ता बदल गया॥"
Comment by Sushil.Joshi on October 26, 2013 at 7:34am

आए गए हज़ार मगर कुछ नहीं हुआ,

इक वो चला गया तो ज़माना बदल गया.......  बहुत खूबसूरत आदरणीय डॉ बाली जी......बधाई इस सुंदर प्रस्तुति के लिए...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 25, 2013 at 10:16pm

बढिया ग़ज़ल हुई है, डॉक्टर साहब. बधाइयाँ और शुभकामनाएँ..

कुछ अरसे बाद आये हैं मग़र दुरुस्त आये हैं. :-))

जिसको समझ रहे थे कि बदलेगा न कभी,......   इस मिसरे को जरा देख लें प्लीज.

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 25, 2013 at 7:08pm

सूर्या बालीजी बधाई , सुंदर गज़ल कही।

Comment by ram shiromani pathak on October 25, 2013 at 4:56pm

जिसको समझ रहे थे कि बदलेगा न कभी,

पहचानता नहीं है अब ऐसा बदल गया॥

हमराज़ हमसफ़र भी थे मंज़िल भी एक थी,

आया इक ऐसा मोड़ कि रस्ता बदल गया॥............वाह क्या कहने 

आदरणीय सूर्य बाली भाई,बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है /////हार्दिक बधाई आपको 

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