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ग़ज़ल- सारथी || दर्दे-दिल दीजिये या दवा दीजिये ||

दर्दे-दिल दीजिये या दवा दीजिये 

बस जरा सा सनम मुस्कुरा दीजिये /१ 

लूट ले जायेगा कोई रहजन सनम 

आप दिल को हमीं में छुपा दीजिये /२ 

आखरी साँस भी ले गया डाकिया 

पढ़! उसे भी ख़ुशी से जला दीजिये /३ 

नींद को ठंड लग जाएगी ऐ खुदा   

लीजिये जिस्म मेरा उढ़ा दीजिये /४  

लग रहा है थका वक़्त भी घूमकर 

पांव उसके दबाकर सुला दीजिये /५   

दर्द है , ज़ख्म है लाइए इश्क़ को 

इक नया आदमी फिर बना दीजिये /६ 

शोर है भीड़ है,  यूँ जनाज़े के दिन 

‘सारथी’ इक ग़ज़ल तो सुना दीजिये/७  

.....................................................
वज्न: २१२ २१२ २१२ २१२ 

सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Saarthi Baidyanath on November 4, 2013 at 11:52am

आदरणीय  वीनस केसरी  साहब ... ह्रदय गद गद हो गया आपका आशीष पाकर !...बहुत बहुत आभार व्यक्त करता हूँ आपका ... सादर नमन सहित !

Comment by वीनस केसरी on November 3, 2013 at 12:15am

क्या कहने भाई बहुत खूब

Comment by Saarthi Baidyanath on October 27, 2013 at 3:30pm

जनाब  Nilesh Shevgaonkar साहिब ... नवाजिश ...करम ... मेहरबानी ! पहली बार आपका आशीष मिल रहा है ...हार्दिक ख़ुशी हो रही है ! आपके स्नेहिल शब्दों का मैं ऋणी हूँ !..बहुत बहुत आभार ! सादर नमन स्वीकार करें :)

Comment by Saarthi Baidyanath on October 27, 2013 at 3:25pm

आदरणीय  VISHAAL CHARCHCHIT जी ...हार्दिक धन्यवाद आपका ! सीखने के क्रम में हूँ ...आपने मेरे मिहनत को सराहा है ..बहुत बहुत आभारी हूँ ...आभार मित्र !..नमन सहित :)

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 27, 2013 at 11:42am

वाह वा ....
आखरी साँस भी ले गया डाकिया 
पढ़! उसे भी ख़ुशी से जला दीजिये/२.... रोंगटे खड़े हो गए इस शेर को पढ़कर ... बहुत कुछ छुपा कर बहुत कुछ कह गए आप ... बधाई 

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on October 26, 2013 at 11:13pm

///नींद को ठंड लग जाएगी ऐ खुदा 
लीजिये जिस्म मेरा उढ़ा दीजिये////

वाह - वाह......बहुत ही प्यारी गजल हुई है भाई !!!!

Comment by Saarthi Baidyanath on October 26, 2013 at 12:40pm

मान्यवर  Saurabh Pandey जी , सर्वप्रथम सादर नमन ! आपने अपना कीमती समय दिया है नाचीज की ग़ज़ल पर ...बहुत मेहरबानी ! मोहतरम के सुझाव भी हमारे लिए आदेश ही हैं और मैं पूर्णतः सहमत हूँ आपसे ! वास्तविकता तो ये है कि जब रचनायें इस पारखी मंच पर आती हैं तो अपनी कमियों का पता चलता है! उसको मांजने का निखारने का दुबारा अवसर मिल जाता है ...!!! आदरणीय, प्रयासरत हूँ ....कि अपने जीवन में कम से कम एक दो ग़ज़ल पढ़ने/सुनने लायक लिख सकूँ !. सिखलाते रहेंगे, आशीष देते रहेंगे ..ऐसी आशा करता हूँ ! सादर- सारथी :)

Comment by Saarthi Baidyanath on October 26, 2013 at 12:29pm

जनाब  Shijju Shakoor साहिब ...और आदरणीय  ram shiromani pathak जी ....बहुत मेहरबानी आपकी ! आपकी सराहना से हमेशा प्रेरणा मिलती है ! साथ बने रहिएगा !...सादर नमन सहित :)

Comment by Saarthi Baidyanath on October 26, 2013 at 12:28pm

आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी ...ह्रदय तल से कोटिशः आभार ! आपने ग़ज़ल की सराहना की ...चंद अशआर को अंकित भी किया आपने ...कृतज्ञता प्रकट करता हूँ !..बहुत बहुत धन्यवाद आपका ! नमन स्वीकार करें :)


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 25, 2013 at 7:53pm

बढिया कोशिश के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय बैद्यनाथ सारथी जी.

मतला को मेरी समझ से थॊड़ा और समय देना था.

डाकिया वाले शेर पर मेरा भी यही कहना है कि वो थोड़ा अस्पष्ट है. आदरणीय सुशील भाई का कहना सही है. यदि डाकिया शब्द के प्रति आग्रह न बन गया हो तो उसे बेहतर किया जा सकता है,

जैसे ..

आखरी साँस भी खत में भेजा सनम 
पढ़ उसे भी ख़ुशी से जला दीजिये.. . .. या, ऐसा ही कुछ.

यही कुछ इस शेर के साथ भी है -

लग रहा है थका वक़्त भी घूमकर 
पांव उसके दबाकर सुला दीजिये.. ... इस शेर में घूम कर बेमतलब टहलने आदि का अर्थ ले रहा है लेकिन घूमना यानि turn around भी दिमाग़ में आ रहा है. बन सके तो इसे भी देख लें.

ये मेरे सुझाव कोई आरोपण न होकर मात्र भाव साझेदारी है. कृपया अन्यथा न लें

शुभ-शुभ

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