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मिला नज़र से नज़र, सब्र आज़माते रहे,

1212 1122 1212 22  .... अंतिम रुक्न ११२ भी पढ़ा गया है ..
.

नज़र, नज़र से मिला, सब्र आज़माते रहे,
मेरे रक़ीब मुझे देख, तिलमिलाते रहे.  

घटाएँ, रात, हवा, आँधियाँ करें साज़िश,
मगर चिराग़ ये बेखौफ़ जगमगाते रहे.
.

गुनाह, जुर्म, सज़ा, माफ़ आपकी कर दी,
ये कह दिया तो बड़ी देर सकपकाते रहे.
.

खफ़ा खफ़ा से रहे बज़्म में सभी मुझसे,
वो पीठ पीछे मेरे शेर गुनगुनाते रहे.  
.

मिला हमें न सुकूँ दफ्न कब्र में होकर,
किसी की ज़ुल्फ़ अदा, अश्क़ याद आते रहे. 
.

फ़रेब झूठ सरीखे, बना लिए साथी,
इबादतों में ख़ुदा को मगर भुलाते रहे.
.

पुकारता है किसे ‘नूर’ इस जहाँ में अब,
कि कश्तियाँ, तेरे साहिल ही ख़ुद डुबाते रहे.  
..........................................................
निलेश 'नूर'
मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 819

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 22, 2013 at 5:16pm

शुक्रिया सौरभ जी, बैद्यनाथ जी
आभार

 

Comment by Saarthi Baidyanath on October 22, 2013 at 4:46pm

उम्दा ग़ज़ल हेतु अनंत बधाइयाँ .... बेहतरीन अशआर हैं ...वाह साहिब :)


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 22, 2013 at 11:38am

घटाएँ, रात, हवा, साथ मिल करें साज़िश, 
मगर चिराग़ तो बेखौफ़ जगमगाते रहे.........  :-))))))))))))))

वाह

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 22, 2013 at 11:27am

आदरणीय Saurabh Pandey जी,
बहुत बहुत धन्यवाद.. आप के इस कमेंट से मुझ में भी एक थॉट प्रोसेस डेवलप हुई है ...आप ने एकदम ठीक कहा है. क्या इसे यूँ किया जा सकता है ??    
घटाएँ, रात, हवा, साथ मिल करे साज़िश, 
मगर चिराग़ ये बेखौफ़ जगमगाते रहे.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 22, 2013 at 10:38am

घटाएँ, रात, हवा, आँधियाँ करें साज़िश,
मगर चिराग़ ये बेखौफ़ जगमगाते रहे.

यह शेर भला लगा है, लेकिन हवा और आँधियाँ दोनों को साथ लेना हो तो मैं न लेता. दोनों एक ही बिम्ब के दो पहलू हैं.

लेकिन की रात द्वारा हो रही साजिश सोच कर मन खुश हो गया. चिराग़ के जलते जाने का सबसे बड़ा सबब रात ही हुआ करती है यानि कमअक्ली के बरअक्स अपनी समझ को जिलाते जाना.. 

आप अच्छा कह रहे हैं भाईजी. हार्दिक बधाइयाँ

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 22, 2013 at 9:30am

धन्यवाद आदरणीया अन्नपूर्णा जी, आदरणीय गिरिराज जी, आदरणीय डॉ अनुराग सैनी जी...   

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 21, 2013 at 11:06pm

वाह | वाह | मजा आ गया | तहे दिल से बधाई |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 21, 2013 at 8:56pm

आदरणीय नीकेश भाई , बहुत शानदार , कामयाब गज़ल हो गई है सुधारने के बाद !!! पाँचो शेर लाजवाब है !!! बहुत बधाई आपको !!! 

Comment by annapurna bajpai on October 21, 2013 at 6:37pm

आदरणीय नीलेश जी उम्दा गजल हुई है , दिली दाद कुबूल फरमाए । 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 21, 2013 at 4:54pm

शुक्रिया अभिनव जी ..

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