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रावण, रावण को आग लगाये

कलियुग की कैसी माया देखो

रावण, रावण को आग लगाये

दशानन था रावण

इनके हैं सौ- सौ सर

लोभ, मोह, मद, इर्ष्या ,

द्वेष, परिग्रह, लालच,

राग , भ्रष्टाचार, मद, मत्सर

रहे बजबजा इनके भीतर

फिर भी  जरा नहीं शर्माए .

कलियुग की कैसी माया देखो

रावण, रावण को आग लगाये .

पंडित था रावण ,

था, अति बलशाली ,

धर्महीन हैं ये, हृदयहीन ,

विवेकशून्य , मर्यादा से खाली.

आचरण हो जिनका राम सा

जनता जिनके राज्य में

भयमुक्त हो, फूले नहीं समाये.

उन्हें ही हक है, आगे आकर

रावण को आग लगाये .

... नीरज कुमार ‘नीर’

पूर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Neeraj Neer on October 18, 2013 at 10:49pm

आप सभी आदरणीय महानुभावों का हार्दिक अभाव..

Comment by Neeraj Neer on October 18, 2013 at 10:48pm

मेरा लैपटॉप ख़राब होने के कारण मैं समय पर उपस्थित नहीं हो सका क्षमाप्रार्थी हूँ 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 17, 2013 at 9:28pm

सार्थक प्रस्तुति आ० नीरज कुमार जी 

हार्दिक बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 16, 2013 at 10:55am

आज के रावण के तो दस नहीं बीस सर हैं ढूंढो तो और भी मिल जायेंगे ,वो भी रावन को जलाकर अपने को विजयी मानते हैं 

आचरण हो जिनका राम सा

जनता जिनके राज्य में

भयमुक्त हो, फूले नहीं समाये.

उन्हें ही हक है, आगे आकर

रावण को आग लगाये .------रचना में बहुत सुन्दर सन्देश दिया है ,इनको रचना की बहुमूल्य पंक्तियाँ कहूँगी ,बहुत बढ़िया बधाई आपको 

Comment by बृजेश नीरज on October 15, 2013 at 10:40pm

अच्छी रचना है आपकी! इस अभिव्यक्ति पर आपको हार्दिक बधाई!

भाई जी यदि आप चाहते तो रचना और अच्छी हो सकती थी!

Comment by विजय मिश्र on October 15, 2013 at 7:05pm
आज की प्रवंचनालिप्त ,छ्लयुक्त क्षुद्र राजनीति पर यथोचित प्रहार . अनैतिकता ,मर्यादाहीनता और कलुषता को यथोक्त पाठ पढाने की असफल चेष्टा कियी है आपने अपने इस सुगम रचना से .अनेकानेक शुभकामनाएँ नीरजी
Comment by Sushil.Joshi on October 15, 2013 at 5:24am

बहुत ही सटीक प्रस्तुति है आदरणीय नीरज भाई...... सचमुच ही राम का तो अभाव ही है ...... आज तो रावण ही रावण को जला रहा है..... बधाई सत्यता व्यक्त करती इस कृति के लिए....

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 14, 2013 at 3:24pm

दशानन था रावण

इनके हैं सौ- सौ सर

लोभ, मोह, मद, इर्ष्या ,

द्वेष, परिग्रह, लालच,

राग , भ्रष्टाचार, मद, मत्सर

रहे बजबजा इनके भीतर

फिर भी  जरा नहीं शर्माए .

अत्यंत सटीक बात, सही सन्देश देती रचना, बधाई स्वीकारें आदरणीय नीरज जी

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 14, 2013 at 3:14pm

बिलकुल सही कहा है आपने ..रचना में निहित सन्देश सब तक पहुचे ये जरूरी है ..हार्दिक बधाई के साथ 

Comment by अजीत शर्मा 'आकाश' on October 14, 2013 at 2:59pm

भाई नीर जी, कथ्य अत्यन्त शानदार है..... काव्यात्मकता एवं लयात्मकता का अभाव प्रतीत होता है, ऐसा मैं सोचता हूँ ....

कृपया ध्यान दे...

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