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बुत शहर में बोलते इंसान भी तो हैं!//गज़ल//कल्पना रामानी

2122212221222

 

ज़िन्दगी जीने के कुछ, सामान भी तो हैं!

बुत शहर में बोलते, इंसान भी तो हैं!

 

भीड़ से माना कि घर, सिकुड़े बने पिंजड़े,

साथ में फैले हुए, उद्यान भी तो हैं!

 

और अधिक के लोभ में, नाता घरों से तोड़,

मूढ़ गाँवों ने किए, प्रस्थान भी तो हैं।

 

गाँव ही आकर अकारण हैं मचाते भीड़

यूँ शहर में बढ़ गए व्यवधान भी तो हैं!

 

क्यों नहीं हक माँगते, शासन से आगे बढ़?

जानकर ये बन रहे, नादान भी तो हैं!

 

हल चलाते हाथ कोमल हो नहीं सकते,

श्रम से होते रास्ते, आसान भी तो हैं!

 

माँ-पिता क्यों दोष देते, पुत्र को ही आज?

मन में उनके कुछ दबे, अरमान भी तो हैं।

 

दोष देने से शहर को, क्या भला हासिल?

ये शहर जन के लिए, वरदान भी तो हैं!  

 

मौलिक व अप्रकाशित

कल्पना रामानी

 

Views: 1029

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Comment by vandana on October 10, 2013 at 7:11am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल आदरणीया कल्पना मैम वाह 

Comment by annapurna bajpai on October 9, 2013 at 10:56pm

वाह !! आदरणीयआ कल्पना दी , बहुत सुंदर गजल , बहुत बधाई । 

Comment by Sushil.Joshi on October 9, 2013 at 8:48pm

अपने भीतर सुंदर भावों को समेटे इस सुंदर कृति के लिए हार्दिक बधाई आपको आदरणीया कल्पना जी...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 9, 2013 at 8:42pm

आदरणीया कल्पना जी बहुत उम्दा ग़ज़ल लिखी है हर शेर एक सन्देश दे रहा है एक संशय आपने शहर की मात्रा १२ लगाईं है जब की मुझे गुरुजनों ने हमेशा ग़ज़ल में शह्र  अर्थात २१ बताया है ,हो सकता है शहर भी ठीक हो किन्तु संशय तो है ही ,खैर फिलहाल आप इस सार्थक ग़ज़ल के लिए दिली दाद कबूलें 

Comment by शकील समर on October 9, 2013 at 7:13pm

शंका दूर करने के लिए बहुत बहुत आभार आदरणीया कल्पना रामानी जी

Comment by कल्पना रामानी on October 9, 2013 at 6:49pm

आदरणीय विजय जी, आदरणीय कवि-राज बुन्देली जी, आदरणीय गिरिराज भण्डारी जी, आदरणीय विजय जी, आदरणीय श्याम नरेन जी, आदरणीया कुंती जी, आप सबका हृदय से धन्यवाद।

Comment by कल्पना रामानी on October 9, 2013 at 6:45pm

आदरणीय शकील जी, आपको गज़ल पसंद आई, इसके लिए हार्दिक धन्यवाद। नीचे मैंने बहर स्पष्ट कर दी है। शायद आपकी शंका का निवारण हो जाए।

 

  2 /  1   2   2   2   / 1     2      2    2  / 1  2    2    2

//भी+ड़/ से/ मा+ना/ कि/ घर/, सिकु+ड़े/ ब+ने पिंज+ड़े//

Comment by शकील समर on October 9, 2013 at 5:43pm

सुंदर कहन आदरणीया कल्पना रामानी जी। मैं बहर के मामले में थोड़ा अल्पज्ञ हूं। एक निवेदन है। निम्न मिसरे की तक्तीअ कर दें, ताकि कुछ संशय दूर हो जाए।

//भीड़ से माना कि घर, सिकुड़े बने पिंजड़े//

सादर..................

Comment by विजय मिश्र on October 9, 2013 at 5:14pm
सुंदर गजल के साथ साथ जागरण सन्देश भी , सचेष्टता और सजगता का न्योता भी ,साधुवाद कल्पनाजी
Comment by Shyam Narain Verma on October 9, 2013 at 4:58pm
बहुत ही सुन्दर! हार्दिक बधाई आपको ......

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