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दर्द क्या इक नया फिर कोई बो रहा ( गज़ल - गिरिराज भंडारी )

212    212    212     212 

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छांव में धूप का क्यों गुमाँ हो रहा

दर्द क्या इक नया फिर कोई बो रहा

 

सड़ चुकी मान्यता सांस फिर ले रही

दिन चढ़े तक कोई शख़्स ज्यों सो रहा  

 

ज़ाहिरन बात ये कह रहा है करम

बढ़ गया पाप जब तो कोई धो रहा

 

हाल की शक्ल में फ़र्क़ कुछ तो रहे

कल गया बीत वो जो रहा सो रहा

 

पश्चिमी कुछ हवा सभ्यता खा रही

आदमी इसलिये आदमी खो रहा

 

तितलियाँ ख़ौफ़ से उड़ नही पा रहीं

वाक़िआ कुछ बुरा रोज़ ही हो रहा

 

रोशनी भी कहीं दिख रही है मगर

अब्र भी कुछ घना उस तरफ हो रहा

 

    मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 24, 2013 at 8:15pm

आदरणीय नीरज भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका दिली शुक्रिया !!

Comment by Neeraj Neer on September 24, 2013 at 7:34pm

वाह! बहुत ही उम्दा ग़ज़ल 

सड़ चुकी मान्यता सांस फिर ले रही

दिन चढ़े तक कोई शख़्स ज्यों सो रहा  

बहुत खूब .. बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 24, 2013 at 1:09pm

आदरणीय अरुन भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 24, 2013 at 1:08pm

आदरणीया परवीन मलिक जी , हौसला अफज़ाई के लिये तहे दिल से आपका शुक्रिया !!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 24, 2013 at 1:07pm

आदरणीया शशि जी , गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 24, 2013 at 1:05pm

आदरणीय आशुतोष भाई , हौसला अफज़ाई के किये तहे दिल से शुक्रिया !!

Comment by Parveen Malik on September 24, 2013 at 12:03pm
आदरणीय गिरिराज जी बेहतरीन गजल ... बधाई स्वीकारें

तितलियाँ ख़ौफ़ से उड़ नही पा रहीं
वाक़िआ कुछ बुरा रोज़ ही हो रहा

रोशनी भी कहीं दिख रही है मगर
अब्र भी कुछ घना उस तरफ हो रहा !!!!
Comment by अरुन 'अनन्त' on September 24, 2013 at 11:14am

वाह आदरणीय गिरिराज जी वाह क्या कहने ओ बी ओ पर ग़ज़लों की बहार आ गई है आनंद आ रहा है, सभी अशआर अच्छे हैं अंतिम तीन अशआर तो कमाल के हैं आदरणीय उनके लिए अधिक दाद कुबूल फरमाएं.

Comment by shashi purwar on September 24, 2013 at 11:02am

बेहतरीन उम्दा गजल  वाह

छांव में धूप का क्यों गुमाँ हो रहा

दर्द क्या इक नया फिर कोई बो रहा

 

सड़ चुकी मान्यता सांस फिर ले रही

दिन चढ़े तक कोई शख़्स ज्यों सो रहा  

 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 24, 2013 at 10:29am

आदरणीय गिरिराज जी ..वर्तमान परिदृश्य पर चिंतन करती हुई एक शसक्त ग़ज़ल 

पश्चिमी कुछ हवा सभ्यता खा रही

आदमी इसलिये आदमी खो रहा

 

तितलियाँ ख़ौफ़ से उड़ नही पा रहीं

वाक़िआ कुछ बुरा रोज़ ही हो रहा

 ..ये दोनो शेर मुझे बेहद पसन् आये ..सादर बधाई के साथ 

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