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ग़ज़ल
वजन : 2212 2212

 

बकवास सारा आ गया,
खबरों में रहना आ गया ।1। 
 

जो धड़कनें पढ़ने लगे, 
तो शेर कहना आ गया ।2।

 

जब सिर बँधी पगड़ी मेरे,
तब ही से सहना आ गया ।3।

 

जब से सियासत सीख ली,
कह के मुकरना आ गया ।4।

 

दो बेटियों का बाप हूँ,
मुझको भी डरना आ गया ।5।

(मौलिक व अप्रकाशित)

पिछला पोस्ट => लघुकथा : डर

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Comment by Abhinav Arun on September 15, 2013 at 6:17am

हम सब समवेत सीख रहे हैं बागी जी ..आभार और स्नेह का शुक्रिया ..जय ओ बी ओ !

Comment by वीनस केसरी on September 15, 2013 at 1:23am

कठिन और कम लयात्मक बहर के साथ बड़ी रदीफ़ को चुनना एक ऐसा खतरनाक काम है जिसे इस ग़ज़ल में अंजाम तक पहुँचाया गया है
इसके लिए बधाई

इता दोष के प्रति आग्रही होना ग़ज़ल को दोष मुक्त करने के लिए बढ़ाया गया पहला कदम होगा फिर आगे कहन को लेकर बातें सामने आयेंगी
ग़ज़ल में गज़लियत होना भी अनिवार्य है
सपाटबयानी आज ग़ज़ल के लिए बड़ा खतरा बन कर उभरी है इससे भी हमें ही लड़ना है

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 14, 2013 at 11:08pm

आदरणीय भ्राताश्री छोटी बहर में बहार ला दी आपने क्या खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने हरेक शेर लाजवाब है दिल से ढेरों बधाई भाई जी और अंतिम शेर पर विशेष तौर से बधाई स्वीकारें इस शेर में आपने अपने मेरे और तमाम पिताओं के ह्रदय की भावना को व्यक्त कर दिया है.

बकवास करना आ गया,
खबरों में रहना आ गया ।1। बिलकुल सही भाई जी वाह

 

धड़कन जो पढ़ना आ गया,
तो शेर कहना आ गया ।2। क्या कहने आशिकाना

 

जब सिर बँधी पगड़ी मेरे,
तब ही से सहना आ गया ।3। आय हाय

 

जब से सियासत सीख ली,
कह के मुकरना आ गया ।4। सटीक सत्य

 

दो बेटियों का बाप हूँ,
मुझको भी डरना आ गया ।5। दिल की बात कह दिया भाई जी ढेरों बधाइयाँ ढेरों बधाइयाँ

Comment by annapurna bajpai on September 14, 2013 at 11:00pm

जब से सियासत सीख ली,
कह के मुकरना आ गया ।4।

दो बेटियों का बाप हूँ,
मुझको भी डरना आ गया ।5।..................... आ0 बागी जी बहुत ही बढ़िया गजल कही, सामयिक भाव । बहुत बधाई आपको ।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 14, 2013 at 5:35pm

सहज सरल और उम्दा भाव गजल के लिए बधाई आदरणीय श्री गणेशजी बागी जी 

Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on September 14, 2013 at 4:41pm

छोटी बहर पर अच्छी गज़ल, आदरणीय बागी जी ! ढेरो दाद कबूलें !

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 14, 2013 at 1:25pm

आदरणीय बागी जी

जब सिर बँधी पगड़ी मेरे,
तब ही से सहना आ गया ।3।

 

जब से सियासत सीख ली,
कह के मुकरना आ गया ।4।,.हर शेर का आनंद उठाया .. लाजबाब शेरो में ये शेर और अंतिम शेर बेहद पसंद आये //सादर प्रणाम के साथ 

Comment by Shyam Narain Verma on September 14, 2013 at 1:03pm
बहुत ही सुन्दर! हार्दिक बधाई आपको!
Comment by Parveen Malik on September 14, 2013 at 12:04pm
बेहद खूबसूरत आदरणीय बागी जी !
दो बेटियों का बाप हूँ,
मुझको भी डरना आ गया....
जायज है जमाने की चाल देखकर डरना !
Comment by Sarita Bhatia on September 14, 2013 at 11:55am

वाह वाह लाजवाब 

दो बेटियों का बाप हूँ,
मुझको भी डरना आ गया ।

बहुत बहुत बधाई गणेश भाई जी 

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