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ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बदलियों से चाँदनी का झिलमिलाना शेष है।
घन तिमिर में दीपकों का बुदबुदाना शेष है॥
सावनों की खो चुकी झड़ियाँ कहीं मिल जाएँगी,
देवदारों की कतारों का सजाना शेष है।
फिर घृणा उन्मादिनी सी दौड़ती है प्राण में,
प्रीत के आखर अढ़ाई कसमसाना शेष है।
हलचलों में खो चली है रात की नि:शब्दता,
भोर की पहली किरण का खिलखिलाना शेष है।
रूढ़ियों के बाँध सारे तोड़ कर कविता बहे,
पीर की प्राचीर में यूँ छटपटाना शेष है।
फिर परिन्दों ने बदल दी आज उड़ने की अदा,
हाय! लेकिन तितलियों का तिलमिलाना शेष है।
बैरियों की घात से,आघात से अवगत हुए,
यार की मीठी छुरी से घर बचाना शेष है।
गाल गीले भी हुए,रतनार भी,गुलनार भी,
चोट खा अन्याय की बस तमतमाना शेष है।
फिर नए दीवार,दर,छज्जे उठाए जाएँगे,
इन पुराने गुम्बदों का चरमराना शेष है।
आह, कितना आस्था की आरती का शोर है,
देवता सा मौन हो कर मुस्कुराना शेष है।
अंतरालों में,सवालों में घुटी है जिंदगी,
पाखियों सा वादियों में गीत गाना शेष है।
सब अदाएँ,भंगिमाएँ हैं बनावट की 'रवी',
चूर मन की मस्तियों में लड़खड़ाना शेष है॥

मौलिक व अप्रकाशित।

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Comment

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Comment by Ravi Prakash on September 14, 2013 at 7:02pm
इतना स्नेह और आशीर्वाद देने के लिए कोटिश: धन्यवाद ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 14, 2013 at 4:33pm

बैरियों की घात से,आघात से अवगत हुए,
यार की मीठी छुरी से घर बचाना शेष है।............लाजवाब शेर 

बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर गज़ल पर 

Comment by Abhinav Arun on September 14, 2013 at 9:39am

बड़ी रौ - दार और असरदार ग़ज़ल कही है 

बहुत बधाई !

कहन भी सुन्दर हैं 

वाह वाह 

बहुत शुभकामनायें भी रवि जी !!

Comment by Ravi Prakash on September 14, 2013 at 9:23am
विजय जी एवं भ्रमर जी। सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद। आशीर्वाद बनाए रखें॥
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 14, 2013 at 12:20am

रूढ़ियों के बाँध सारे तोड़ कर कविता बहे,
पीर की प्राचीर में यूँ छटपटाना शेष है।

गाल गीले भी हुए,रतनार भी,गुलनार भी,
चोट खा अन्याय की बस तमतमाना शेष है।

प्रिय विजय जी ...बहुत सुन्दर ..भाव प्रबल और कोमल सभी अशआर अच्छे बने
भ्रमर ५

Comment by विजय मिश्र on September 13, 2013 at 12:51pm
बहुत अर्थपूर्ण ,भावपूर्ण रचना ,आभार रविजी .पढकर एकबार और पढ़ने की इच्छा हो उठी|'गाल गीले ...... ' और ' आह , कितना ...... .| मुझे अप्रतिम लगा |रचना के क्रम में उसके अर्थ की सर्वोच्चता का निर्वाह कभी-कभी अत्यंत जटिल होता है और लोग सहज ही समझौता कर आगे बढ़ जाते है |आपकी रचनाओं में इस मर्यादा का अनुशासन सदैव दीखता है |पुनः साधुवाद रवि प्रकाशजी |
Comment by बृजेश नीरज on September 13, 2013 at 12:34pm

वाह! बहुत ही सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!
यदि बहर का भी जिक्र कर देते तो सबको सरलता होती।
सादर!

Comment by vijay nikore on September 13, 2013 at 10:48am

इस अच्छी गज़ल के लिए बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Ravi Prakash on September 13, 2013 at 8:47am
Thanks Shijju ji.. I have got it..
Comment by vandana on September 13, 2013 at 6:26am

गाल गीले भी हुए,रतनार भी,गुलनार भी,
चोट खा अन्याय की बस तमतमाना शेष है।

बहुत शानदार ग़ज़ल 

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