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हुआ बुद्धि-बल अन्ध, भजे रविकर ओसारे-

ओसारे में बुद्धि-बल, मढ़िया में छल-दम्भ |
नहीं गाँव की खैर तब, पतन होय आरम्भ |


पतन होय आरम्भ, बुद्धि पर पड़ते ताले |
बल पर श्रद्धा-श्राप, लाज कर दिया हवाले |


तार-तार सम्बन्ध, धर्म- नैतिकता हारे |
हुआ बुद्धि-बल अन्ध, भजे रविकर ओसारे ||

मौलिक / अप्रकाशित

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Comment by राजेश 'मृदु' on September 4, 2013 at 6:03pm

सुन्‍दरम, अति सुन्‍दरम, सादर

Comment by रविकर on September 4, 2013 at 2:19pm

आदरणीय / आदरेया
आप सभी का बहुत बहुत आभार-
सादर

Comment by Meena Pathak on September 4, 2013 at 9:10am

बहुत सुन्दर ... बधाई स्वीकारें आ० रविकर जी

Comment by रमेश कुमार चौहान on September 3, 2013 at 10:02pm
आदरणीय रविकरजी भारतीय छंद विधा में व्यंग का पुट बहुत ही सुंदर प्रयोग बहुत बहुत बधाई ।
Comment by ram shiromani pathak on September 3, 2013 at 9:50pm

पतन होय आरम्भ, बुद्धि पर पड़ते ताले |
बल पर श्रद्धा-श्राप, लाज कर दिया हवाले |///////////बहुत सटीक व्यंग है आदरणीय //हार्दिक बधाई आपको //सादर 

Comment by mrs manjari pandey on September 3, 2013 at 9:02pm

          आदरणीय रविकर जी सुन्देर दोहों के लिये बधाई स्वीकारें  !

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 3, 2013 at 8:04pm

इन सामयिक कुंडलियों के माध्यम से छल-दंभ पर चोट करने के लिए बधाई भाई श्री रविकर जी 

Comment by बृजेश नीरज on September 3, 2013 at 6:59pm

वाह! बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by annapurna bajpai on September 3, 2013 at 4:31pm

आ० रविकर जी उत्तम दोहे , बहुत बधाई आपको । 

Comment by Shyam Narain Verma on September 3, 2013 at 2:56pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ.

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