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मैं तेरा हूँ बस तेरा

तेरे दिल में मेरा बसेरा

मेरे दिल में तेरा ही डेरा

सारी उम्र तू हसीन कर ले

मुझ पर तू यकीन कर ले.....

क्यूँ बार बार दिल तोडती है

इरादों को यूँ मोड़ती है

जब किस्मत हमें जोड़ती है

दूरियों को तू महीन कर ले

मुझ पर तू यकीन कर ले.....

आजा छोटा सा जीवन है

चार दिनों का यौवन है

हर मौसम ही सावन है

खुशी  को तू आमीन कर ले

मुझ पर तू यकीन कर ले....

हम दोनों है और कोई नही

कोई तेरा नही कोई मेरा नही

तू जहाँ है मैं हूँ वहीं

आसमां को तू जमीन कर ले

मुझ पर तू यकीन कर ले...

दूरी में हर परेशानी है

ये कैसी बातें ठानी है

हमदोनों ही अभिमानी है

यादों को तू नमकीन कर ले

मुझ पर तू यकीन कर ले....

जितेन्द्र 'गीत'

मौलिक व् अप्रकाशित

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 29, 2013 at 11:32pm

आदरणीया श्रीमती मंजरी जी

रचना को आपने पसंद किया, रचना सार्थक हुयी, आपका बहुत बहुत आभार, आशीर्वाद बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 29, 2013 at 11:27pm

आदरणीय विजय निकोर जी

आपका बहुत बहुत आभार, आपने रचना पर समय देकर लेखनकर्म का मनोबल दोगुना कर दिया, आशीर्वाद व् स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 29, 2013 at 11:21pm

आदरणीय अरुण अनंत जी

रचना पर आपके मार्गदर्शन से बहुत ख़ुशी मिली, आपकी बात //रचना आपसे समय की मांग करती दीख रही है,// स्वीकार करता हूँ, स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 29, 2013 at 11:05pm

आदरणीय बृजेश जी!
आपका सुझाव बहुत अच्छा है। मुझे मान्य है आपके द्वारा सुझाया गया परिवर्तन।
आपका आभार आदरणीय बृजेश जी!

सादर!

Comment by mrs manjari pandey on August 25, 2013 at 2:45pm

  आदरणीय जितेन्द्र जी अच्छी रचन . बधाई

Comment by vijay nikore on August 24, 2013 at 7:36pm

आदरणीय जितेन्द्र जी:

 

इस अति मनमोहक भाव से सुसज्जित रचना के लिए बधाई।

आपकी और रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

 

सादर,

वि्जय निकोर

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 24, 2013 at 12:47pm

आदरणीय जीतेंद्र भाई प्रयास बहुत ही सुन्दर बन पड़ा है किन्तु रचना आपसे समय की मांग करती दीख रही है, बहरहाल प्रयास पर बधाई स्वीकारें.

Comment by बृजेश नीरज on August 24, 2013 at 12:27pm

बहुत अच्छा प्रयास है। कथ्य को और साधने का प्रयास करें।

//आज छोटा सा जीवन है

चार दिनों का यौवन है//

यदि इसको ऐसा कुछ लिखें-

‘आज तो यह यौवन है

चार दिनों का जीवन है’

तो कैसा रहेगा?

इस प्रयास पर आपको हार्दिक बधाई!

 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 23, 2013 at 11:51pm

आपकी उत्साह बर्धन करती अनुपम प्रतिक्रिया से मन में हर्ष की लहर दौड़ गई, आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय सुरेन्द्र जी

सादर!

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 23, 2013 at 11:00pm

आजा छोटा सा जीवन है

चार दिनों का यौवन है

हर मौसम ही सावन है

खुशी  को तू आमीन कर ले

प्रिय गीत जी ..अब आया न मजा ...जीवन हसीं हो जाए खुशियों के पंछी भोर होते ही चहक जाएँ तो आनंद और आये
भ्रमर ५

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