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लिख दिया तो लिख दिया

हमने तुम्हारी जात पर,जब लिख दिया तो लिख दिया

कुछ बेतुके जज्बात पर;जब लिख दिया तो लिख दिया

 

कितना सुहाना मुल्क है, तुमने कहा अखबार में

बीमार से हालात पर जब लिख दिया तो लिख दिया   

 

जब से खुले बाजार की रख्खी गयी है नींव तो  

हरदिन लगे आघात पर जब लिख दिया तो लिख दिया

 

नक्कारखाना बन गया, सुनता नहीं, कोई कहीं

दिन-रात के उत्पात पर जब लिख दिया तो लिख दिया

 

कश्ती भंवर में है परेशां, नाखुदा कोई नहीं

फिर गर्दिशे हालात पर जब लिख दिया तो लिख दिया

 

यह देश सारा जल रहा, बस घर तुम्हारे जश्न है   

ऐसे ही तहकीकात पर जब लिख दिया तो लिख दिया

 

चुपचाप कितने रोज तक, हम भी दबाते यूँ कहो

हर बात की औकात पर, जब लिख दिया तो लिख दिया

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Comment

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Comment by Shyam Narain Verma on August 6, 2013 at 2:26pm
भावनाओं से ओतप्रोत रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें.... 
Comment by वेदिका on August 6, 2013 at 1:09pm

यही तो सच्चाई है और सामने आनी ही चाहिए 

यह देश सारा लुट रहा पर घर तुम्हारा भर रहा

ऐसे ही तहकीकात पर जब लिख दिया तो लिख दिया

 

बहुत सही किया आपने जो लिख दिया !! 

Comment by Meena Pathak on August 6, 2013 at 12:59pm

चुपचाप कितने रोज तक, हम भी दबाते  यूँ भला  

हर बात की औकात पर, जब लिख दिया तो लिख दिया................. बेहतरीन लिखा आप ने, बधाई स्वीकारें 

.

Comment by बसंत नेमा on August 6, 2013 at 12:57pm

बहुत खूब सुन्दर ...बधाई आ0 डाँ . ललित जी 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 6, 2013 at 12:27pm

उम्दा गजल पर, हार्दिक बधाई स्वीकार करें, आदरणीय डा. ललित जी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 6, 2013 at 11:49am

ग़ज़ल अच्छी हुई है मोहतरम डॉ ललित कुमार सिंह जी, जिसके लिए आपको दिली मुबारकबाद. अलबत्ता आखिरी टीम शेअरों में ऐब-ए-तकाबुले-रदीफैन बदमजगी पैदा कर गया.  

Comment by aman kumar on August 6, 2013 at 10:14am

यह सोचकर मैं हूँ परेशां, मुल्क कैसे चल रहा

बिन दुल्हे की बारात पर जब लिख दिया तो लिख दिया....

एक लेखक को कलम मिलती है भगवन से ,

अपने जज्बातों को दुनिया के सामने आईने की तरह रखना उसका धर्म बन जाता है \

जिसको आप बखूबी निभा रहा है ! आभार !

Comment by Saurabh Srivastava on August 6, 2013 at 9:57am

वाह! लिख दिया अच्छा किया...

कृपया ध्यान दे...

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