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ग़ज़ल - दुआओं की तिजारत हो रही है !

ग़ज़ल -
.

भुलाए पर, यहाँ तक भी न कोई ।

सताए पर, यहाँ तक भी न कोई ।

मुझे हर आइने ने झूठ बोला ,
निभाये, पर यहाँ तक भी न कोई ।

मुहब्बत से भरोसा उठ गया है ,
सताए, पर यहाँ तक भी न कोई ।

फिर औलादें ही अपनी गलियां दे,
लुटाए, पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
पतंगे खेल  कुदरत के बिगाड़ें ,
उड़ाए, पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
दुआओं की तिजारत हो रही है
कमाए पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
किया माँ बाप का एहसान समझें ,
पढ़ाए पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
दो बेटों में बंटें माँ बाप बिखरे ,
लड़ाए पर यहाँ तक भी न कोई ।
               
* सर्वथा मौलिक और अप्रकाशित 
                  -   अभिनव अरुण 
                 [may - june 2013]
              

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Comment

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Comment by Neeraj Nishchal on July 25, 2013 at 9:43pm

मुझे हर आइने ने झूठ बोला ,
निभाये, पर यहाँ तक भी न कोई ।

मुहब्बत से भरोसा उठ गया है ,
सताए, पर यहाँ तक भी न कोई ।

bahut hi khoobsurat

Comment by annapurna bajpai on July 24, 2013 at 7:25pm

आदरणीय अभिनव जी बहुत ही बढ़िया गजल के लिए बधाई ।

Comment by Ketan Parmar on July 24, 2013 at 4:33pm


दुआओं की तिजारत हो रही है
हमें उनसे मुहब्बत हो रही है

khoob surat sir ji kyaa kahne

Comment by ram shiromani pathak on July 24, 2013 at 3:37pm
दुआओं की तिजारत हो रही है
कमाए पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
किया माँ बाप का एहसान समझें ,
पढ़ाए पर यहाँ तक भी न कोई ।///////////बहुत सुंदर बहुत सुंदर
आदरणीय अरुण अभिनव जीबहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है///हार्दिक बधाई //सादर 
Comment by coontee mukerji on July 24, 2013 at 3:23pm

बहुत सुंदर गजल आदरणिय.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 24, 2013 at 3:06pm

आदरणीय अरुण अभिनव जी,

ये गज़ल भी लाजवाब हुई है 

बहुत बहुत बधाई 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 24, 2013 at 11:31am

वाह वाह वाह !!!!! बहरे हज़ज़ मुसद्दस महजूफ में क्या कमाल की ग़ज़ल कही है आदरणीय अरुण भाई जी, इतनी ज़बरदस्त रदीफ़ को कितनी सरलता से निभाया है - कमाल, आनंद आ गया. मेरी दिली बधाई स्वीकारे करें. 

Comment by Ketan Parmar on July 24, 2013 at 11:22am

दो बेटों में बंटें माँ बाप बिखरे ,
लड़ाए पर यहाँ तक भी न कोई ।

bahut hi sunder or mukammal sher or kaafi achi kahi aapne ye ghazal

badhai sweekare sir ji


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 24, 2013 at 9:28am

ग़ज़ब का रदीफ़ लिया है आपने भाई !!  वाह !!!

पूरी ग़ज़ल मन को ख़ुराक़ दे गयी. यही आपसे अपेक्षित है. दिल से दाद कुबूल करें. 

भाई आशीष नैथानी जी के कहे से मैं भी सहमत हूँ. गालियाँ का गलियां  हो जाना टंकण भूल ही है.

शुभम्

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on July 23, 2013 at 11:06pm

वाह वाह क्या कहने !!!

मुझे हर आइने ने झूठ बोला ,
निभाये, पर यहाँ तक भी न कोई ।

दुआओं की तिजारत हो रही है

कमाए पर यहाँ तक भी न कोई ।    लाजवाब !!!

/* फिर औलादें ही अपनी गलियां दे,  */

गालियाँ शायद गलियां हो गया है...

मजा आ गया...
इस शानदार ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय अभिनव जी  !!!  

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